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हम कुछ ऐसे तेरे दीदार में खो जाते है
जैसे बच्चे भरे बाज़ार में खो जाते है

मुस्तकिल जूझना यादो से बहुत मुश्किल है
रफ्ता-रफ्ता सभी घरबार में खो जाते है

इतना सासों की रफाकत पे भरोसा न करो
सब के सब मिटटी के अम्बार में खो जाते है

मेरी खुद्दारी ने अहसान किया है
मुझ पर वर्ना जो जाते है, दरबार में खो जाते है

कौन फिर ऐसे में तनकीद करेगा तुझ पर
सब तेरे जुब्बा-ओ-दस्तार में खो जाते है -मुनव्वर राना
मायने
मुस्तकिल=निरंतर, रफाकत=साथ, तनकीद=आलोचना, जुब्बा-ओ-दस्तार=शाही पहनावा 

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