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अपनी उदास धुप तो घर-घर चली गयी
ये रौशनी लकीर के बाहर चली गयी

नीला-सफ़ेद कोट-जमीं पर बिछा दिया
फिर मुझको आसमान पे लेकर चली गयी

कब तक झुलसती रेत पे चलती तुम्हारे साथ
दरिया कि मौज, दरिया के अन्दर चली गयी

हम लोग ऊँचे पुल के निचे खड़े रहे
उल्टा था बल्ब रौशनी ऊपर चली गयी

लहरों ने घेर रखा था सारे मकान को
मछली किधर से कमरे के अन्दर चली गयी
                                             - बशीर बद्र

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