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कोई उम्मीद बर नहीं आती !
कोई सूरत नज़र नहीं आती !!
मौत का एक दिन मुअय्यन है !
नींद क्यों रात भर नहीं आती !!
आगे आती थी हाले-दिल पर हसी !
अब किसी बात पर नहीं आती !!
जानता हू सवाबे-ताअतो-जुहद !
पर तबियत इधर नहीं आती !!
है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हू !
वरना क्या बात कर नहीं आती ?
क्यों न चीखू कि याद करते है !
मेरी आवाज़ गर नहीं आती !!
हम वहा है  जहा से हमको भी !
कुछ हमारी खबर नहीं आती !!
मरते है आरजू में मरने कि !
मौत आती है पर नहीं आती !!
कबा किस मुह से जाओगे ग़ालिब !
शर्म तुमको मगर नहीं आती !!
                              - ग़ालिब
मायने
मुअय्यन = नियत,  सवाबे-ताअतो-जुहद = संयम तथा उपासना
दिले नादां तुझे हुआ क्या है ?
आखिर इस दर्द कि दवा क्या है  ?
हम है मुश्ताक और वो बेजार !
या इलाही ये माजरा क्या है ?
मै भी मुह मै जुबान रखता हू !
काश ! पूछो कि मुद्दआ क्या है ?
जबकि तुझ बिन नहीं कोई मोजूद !
फिर ये हंगामा ऐ खुदा ! क्या है ?
ये परी-चेहरा लोग कैसे है ?
गमजा-ओ-इशवा-ओ-अदा  क्या है ?
सब्जा-ओ-गुल कहा से आए है ?
अब्रा क्या चीज़ है, हवा क्या है ?
हमको उनसे वफ़ा कि है उम्मीद !
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है ?
हां, भला कर तेरा भला होगा !
दरवेश कि सदा क्या है ?
जान तुम पर निसार करता हू !
मै नहीं जानता दुआ क्या है ?
मैंने माना कि कुछ नहीं ग़ालिब !
मुफ्त हाथ आए तो बुरा क्या है ?
                             - ग़ालिब
मायने 
मुश्ताक = उत्सुक, गमजा-ओ-इशवा-ओ-अदा = नाज और अदा,    
सब्जा-ओ-गुल = पत्ते/फूल, अब्र = बादल, सदा = फकीर की आवाज़
हर इक चिराग कि लो ऐसी सोई-सोई थी
वो शाम जैसे किसी से बिछड के रोयी थी

नहा गया थे मै कल जुगनुओ कि बारिश में
वो मेरे कंधे पे सर रख के खूब रोयी थी

कदम-कदम पे लहू के निशान ऐसे कैसे है
ये सरजमी तो मेरे आंसुओ ने धोयी थी

मकाँ के साथ वो पोधा भी जल गया जिसमे
महकते फूल थे फूलो में एक तितली थी

खुद उसके बाप ने पहचान कर न पहचाना
वो लड़की पिछले फसादात में जो खोयी थी
                                           - बशीर बद्र  
मायने
फसादात-दंगो
गजल को माँ कि तरह बावकार करता हू
मै ममता के कटोरों में दूध भरता हू

ये देख हिज्र तेरा कितना खुबसूरत है
अजीब मर्द हू. सोलह-सिंगार करता हू

बदन समेट के ले जाये जैसे शाम कि धुप
तुम्हारे शहर से मै इस तरह गुजरता हू

तमाम दिन का सफ़र करके रोज शाम के बाद
पहाडियों से घिरी कब्र में उतरता हू

मुझे सुकून घने जंगलो में मिलता है
मै रास्तो से नहीं मंजिलो से डरता हू
                                - बशीर बद्र
मायने
बावकार-प्रतिष्ठित
अपनी उदास धुप तो घर-घर चली गयी
ये रौशनी लकीर के बाहर चली गयी

नीला-सफ़ेद कोट-जमीं पर बिछा दिया
फिर मुझको आसमान पे लेकर चली गयी

कब तक झुलसती रेत पे चलती तुम्हारे साथ
दरिया कि मौज, दरिया के अन्दर चली गयी

हम लोग ऊँचे पुल के निचे खड़े रहे
उल्टा था बल्ब रौशनी ऊपर चली गयी

लहरों ने घेर रखा था सारे मकान को
मछली किधर से कमरे के अन्दर चली गयी
                                             - बशीर बद्र
जब चाहा इकरार किया, जब चाहा इनकार किया
देखो, हमने खुद ही से, कैसा अनोखा प्यार किया
ऐसा अनोखा, ऐसा तीखा, जिसको कोई सह न सके
हम समझे पत्ती-पत्ती को हमने सरशार किया
रूप अनोखे मेरे है और रूप ये तुने देखे है
मैंने चाहा, कर भी दिखाया, जंगल को गुलजार किया
दर्द तो होता रहता है, दर्द के दिन ही प्यारे है
जैसे तेज छुरी को हमने रह-रहकर फिर धार किया
काले चेहरे, कली खुशबू, सबको हमने देखा है
अपनी आँखों से इन सबको, शर्मिंदा हर बार किया
रोते दिल हँसते चेहरों को कोई भी न देख सका
आंसू पी लेने का वादा, हां सबने हर बार किया
कहने जैसी बात नहीं है, बात तो बिलकुल सादा है
दिल ही पर कुर्बान हुए, और दिल ही को बीमार किया
शीशे टूटे या दिल टूटे खुश्क लबो पर मौत लिए
जो कोई भी कर न सका वह हमने आख़िरकार किया
"नाज़" तेरे जख्मी हाथो ने जो भी किया अच्छा ही किया
तुने सब कि मांग सजी, हर इक का सिंगार किया
                                                - मीना कुमारी
मायने- सरशार=उन्मत
आपको बता दे मीना कुमारी जी "नाज" तखल्लुस से लिखती थी 

स्वप्न भरे फूल से,
मीत चुभे शूल से,
लुट गए सिंगार सभी बाग़ के बाबुल से,
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे
करवा गुजर गया, गुबार देखते रहे

नींद भी खुली न थी कि हाय धुप ढल गई,
पाँव जब तलक उठे कि जिन्दगी फिसल गई,
पातपात जहर गए कि शाख-शाख जल गई,
छह तो निकल सकी न, पर उम्र निकल गई,
गीत अश्क बन गए,
छंद हो दफ़न गए,
साथ के सभी दिए धुआ-धुआ पहन गए,
और हम झुके-झुके,
मोड़ पर रुके-रुके,
उम्र के चढाव का उतार देखते रहे
कारवा गुजर गया, गुबार देखते रहे

क्या शबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा,
क्या सुरूर था कि देख आइना सिहर उठा,
इस तरफ जमीं उठी तो आसमान उधर उठा,
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नजर उठा,
एक दिन मगर यहाँ,
ऐसी कुछ हवा चली,
लुट गई कली-कली कि छुट गयी गली-गली,
और हम लूटे-लूटे,
वक़्त से पिटे-पिटे
सास कि शराब का खुमार देखते रहे
कारवा गुजर गया, गुबार देखते रहे

हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद कि सवार दू,
होठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दू,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दू,
और सांस यु कि स्वर्ग भूमि पर उतार दू,
हो सका न कुछ मगर,
शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि दह गए किले बिखर-बिखर,
और हम डरे-डरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मजार देखते रहे
कारवा गुजर गया, गुबार देखते रहे

मांग भर चली कि एक, जब नई-नई किरण,
ढोल के धुमुक उठी, ठुमक उठे चरण-चरण,
शोर मच गया कि चली दुल्हन, चली दुल्हन,
गाँव सब उमड़ पड़ा, बहक उठे नयन-नयन,
पर तभी जहर भरी,
गाज एक वह गिरी,
पूंछ गया सिन्दूर तार-तार हुई चुनरी,
और हम अनजान से,
दूर के मकान से,
पालकी लिए हुए कहार देखते रहे
कारवा गुजर गया, गुबार देखते रहे

                            - गोपालदास नीरज
जिन्दगी जैसी तवक्को थी नहीं, कुछ कम है
हर घडी होता है अहसास कही कुछ कम है

घर कि तामीर तस्सवुर ही में हो सकती है
अपने नक़्शे  के मुताबिक यह जमीं कुछ कम है

बिछड़े लोगो से मुलाकात कभी फिर होगी
दिल में उम्मीद तो काफी है, यकीं कुछ कम है

अब जिधर देखिये लगता है कि इस दुनिया में
कही कुछ ज्यादा है, कही कुछ कम है

आज भी है तेरी दूरी ही उदासी का सबब
यह अलग बात कि पहली सी नहीं कुछ कम है
                                              - शहरयार
दोस्त बनकर भी नहीं साथ निभानेवाला
वही अंदाज है जालिम का जमानेवाला

तेरे होते हुए आ जाती थी सारी दुनिया
आज तनहा हु तो कोई नहीं आने वाला

मुन्तजिर किस का हु टूटी हुए दहलीज पे मै
कौन आएगा यहाँ कौन है आनेवाला

मैंने देखा है बहारो में चमन को जलते
है कोई ख्वाब की ताबीर बतानेवाला

तुम तकल्लुफ़ को भी इखलास समझते हो फराज
दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला - अहमद फराज

Roman

Dost bankar bhi nahi sath nibhanewala
wahi andaj hai jalim ka jamanewala

tere hote hue aa jati thi sari duniya
aaj tanha hu to koi nahi aane wala

muntjeer kis ka hu tuti hui dahleej pe mai
koun aayega yaha koun hai aane wala

maine dekha hai baharo me chaman ko jalate
hai koi khwab ki tabeer batanewala

tum taklluf ko bhi ikhlas samjhate ho faraz
dost hota nahi har haath milane wala- Ahmad Faraz
तेरे इश्क की इन्तहा चाहता हु
मिरी सादगी देख क्या चाहता हु
सितम हो की हो वादा-ऐ-बेहिजाबी
कोई बात सब्र आजमा चाहता हु
यह जन्नत मुबारक रहे जाहिदो को
कि मै आपका सामना चाहता हु
कोई दम का मेहमा हु ऐ अहले-महफ़िल
चिरागे-सहर हु बुझा चाहता हु
भरी बज्म में राज की बात कह दी 
बड़ा बे अदब हु सजा चाहता हु
                             - इकबाल   
कोई चाहत है न जरुरत है
मौत क्या इतनी खुबसूरत है

मौत कि गोद मिल रही हो अगर
जागे रहने कि क्या जरुरत है  

जिन्दगी गढ़ के देख ली हमने
मिटटी गारे कि इक मूरत है

सारे चेहरे जमा है माज़ी के 
मौत क्या दुल्हनो कि सूरत है 
                            - मीना कुमारी 
आगाज तो होता है, अंजाम नहीं होता
जब मेरी कहानी में वह नाम नहीं होता

जब जुल्फ कि कालिख में गुम हो जाये कोई राही
बदनाम सही, लेकिन, गुमनाम नहीं होता

हस-हस के जवा दिल के हम क्यों न चुने टुकड़े ?
हर शख्श कि किस्मत में ईनाम नहीं होता
                                       - मीना कुमारी  

तुम चली जाओगी, परछाईया रह जायेगी
कुछ न कुछ हुस्न कि रानाइया रह जायेगी

तुम तो इस झील के साहिल पे मिली हो
मुझ से जब भी देखूंगा यही मुझ को नजर आओगी

याद मिटती है न मंजर कोई मिट सकता है
दूर जाकर भी तुम अपने को यही पाओगी

खुल के रह जायेगी झोको में बदन कि खुशबू
जुल्फ का अक्स घटाओ में रहेगा सदियों

फूल चुपके से चुरा लेंगे लबो कि सुर्खी
यह जवान हुस्न फिजाओ में रहेगा सदियों

इस धडकती हुई शादाब-ओ-हसी वादी में
यह न समझो कि ज़रा देर का किस्सा हो तुम

अब हमेशा के लिए मेरे मुक्कद्दर कि तरह
इन नजरो के मुक्कद्दर का भी हिस्सा हो तुम

तुम चली जाओगी, परछाईया रह जायेगी
कुछ न कुछ हुस्न कि रानाइया रह जायेगी
                                              - साहिर लुधियानवी

कटेगा देखिये दिन जाने किस अजब के साथ
की आज धुप नहीं निकली आफ़ताब के साथ

तो फिर बताओ समुन्दर सदा को क्यों सुनते
हमारी प्यास का रिश्ता था जब सराब के साथ

बड़ी अजीब महक साथ ले के आई है
नसीम रात बसर की किसी गुलाब के साथ

फिजा में दूर तक मरहबा के नारे है
गुजरने वाले है कुछ लोग यहा से ख्वाब के साथ

जमीन तेरी कशिश खिचती रही हमको
गए जरूर थे कुछ दूर माहताब के साथ
                                        - शहरयार

मायने
सराब = मिराज
यु कभी-कभी तो नजारा करेंगे हम
पहना करो नकाब, उतारा करेंगे हम

महताब कि जबी पे पसीने को देखना
जब नाम लेके तुमको पुकारा करेंगे हम

हमसे इबादतों में कमी रह गई अगर
रह-रह के अपने माथे पे मारा करेंगे हम

मंजिल से मिल सका न हमे गर कोई जवाब
मुड-मुड के फिर से तुमको पुकारा करेंगे हम

वक्ते सहर जो रात कि लो झिलमिला गई
उठ  कर तुम्हारी जुल्फ सवारा करेंगे हम
                                    - मीना कुमारी
मायने-
महताब=चाँद, जबा=माथा, सहर= सुबह
ये काफिले यादो के कही खो गए होते
इक पल भी अगर भूल से हम सो गए होते
ऐ शहर तीर नामो-निशा भी नहीं होता
जो हादसे होने थे अगर हो गए होते
हर बार पलटते हुए घर को यही सोचा
ऐ काश किसी लम्बे सफ़र को गए होते
हम खुश है हमें धुप विरासत में मिली है
अजदाद कही पेड़ भी कुछ बो गए होते
किस मुह से कहे तुझसे समन्दर के है हकदार
सैराब सराबो से भी हम हो गए होते
                                      - शहरयार
शाम तक जब कोई घर आता न था
चैन दिल को रात भर आता न था

बंद रखते अपनी आँखे हम सभी
चाँद जब तक बाम पर आता न था

दूर तक चलते थे सहराओ में हम
देर तक कोई शजर आता न था

इक उफक पे जा के रूक जाती निगाह
और फिर कुछ भी नजर आता न था

दश्ते-तन्हाई का वो लम्बा सफ़र
याद कोई हमसफ़र आता न था

सिर्फ अफसुर्दादिली को क्या कहे
हमको जीने का हुनर आता न था
                        - शहरयार

मायने 
बाम-छत, सहराओं-रेगिस्तानो, उफक-क्षतिज, दश्ते-तन्हाई=अकेलेपन का जंगल,  अफसुर्दादिली-उदासी
हिज्र कि लम्बी रात का खौफ निकल जाये
आँखों पर फिर नींद का जादू चल जाये

बड़ी भयानक साअत आने वाली है
आओ जातां कर देखे शायद टल जाये 

मै फिर कागज कि किश्ती पर आता हु
दरिया से कहला दो ज़रा संभल जाये

या मै सोचु कुछ भी न उसके बारे में
या ऐसा हो दुनिया और बदल जाये

जितनी प्यास है उससे ज्यादा पानी हो
मुमकिन है ऐ काश ये खतरा टल जाये
                                 - शहरयार
मायने
साअत=घडी
जो चाहती है दुनिया वो मुझसे नहीं होगा
समझौता कोई ख्वाब के बदले नहीं होगा

अब रात कि दिवार को ढाना है जरुरी
ये काम मगर मुझसे अकेले नहीं होगा

खुशफहमी अभी तक थी यही कारे-जुनू मे
जो मै नहीं कर पाया किसी से नहीं होगा

तदबीर नयी सोच कोई ऐ दिले-सादा
माइल-ब-करम तुझपे वो ऐसे नहीं होगा

बेनाम से इक खौफ से दिल क्यों है परेशा
जब तय है कि कुछ वक़्त से पहले नहीं होगा
                                                    - शहरयार
मायने
कारे-जुनू=उन्माद, तदबीर=उपाय, माइल-ब-करम=कृपालु
हर तरफ अपने को बिखरा पाओगे
आइनों को तोड़ कर पछताओगे

जब बदी के फुल महकेंगे यहाँ
नेकियो पर अपनी तुम शरमाओगे

सच को पहले लफ्ज़ फिर लब देंगे हम
तुम हमेशा झूठ को झुठलाओगे

फैलता जायेगा सहरा-ए-सुकूत
दूर कि आवाज़ बनते जाओगे

सारी सम्ते बेकशिश हो जायेगी
घूम फिर कर फिर यही आ जाओगे

रूह कि दिवार के गिरने के बाद
बेबदन हो जाओगे मर जाओगे - शहरयार

मायने
बदी=बुराई, सहरा-ए-सुकूत=मौन का रेगिस्तान, सम्ते=दिशाए, बेकशिश=अनाकर्षक


शोला था जल बुझा हु, हवाए मुझे न दो
मै कब का जा चुका हु, सदाए मुझे न दो

जो जहर पी चुका हु तुम्ही ने मुझे दिया
अब तुम तो जिन्दगी कि दुआए मुझे न दो

यह भी बड़ा करम है सलामत है जिस्म अभी
ऐ खुसर्वाने-शहर, कबाए मुझे न दो

ऐसा न हो कभी कि पलट कर न आ सकू
हर बार दूर जा के सदाए मुझे न दो

कब मुझको ऐतराफे-मुह्हबत न था फ़राज़
कब मैंने यह कहा था, सजाए मुझे न दो
                                       - अहमद फ़राज़
मायने
सदा- आवाज, खुसर्वाने-शहर=नगर शासक, काबाए-सम्मानित लिबास, ऐतराफे-मुह्हबत=प्रेम कि स्वीकारोक्ति
धुप हु, साया-ए-दीदार से डर जाता हु
तुझसे मिलता हु तो कुछ और बिखर जाता हु

सहिलो पर मुझे आवाज न देना कोई
आग जिस सिम्त लगी हो मै उधर जाता हु

तू नहीं है तो ख्यालो के अजब मौसम है
जाने किस सोच में चलता हु ठहर जाता हु

आसमा-रंग समुन्दर है तआकुब में मेरे
प्यास लगती है तो सहरा में उतर जाता हु

रूह जलती है बहुत जिस्म पिघलता है बहुत
और मै शहर के जंगल से गुजार जाता हु

किसकी आँखों ने मेरे अक्स पहन रखे है
खुद से मिलना हो तो उस शख्स के घर जाता हु
                                             - जाजिब कुरैशी
दुःख के जंगल में फिरते है कब से मारे-मारे लोग
जो होता है सह लेते है कैसे है बेचारे लोग

जीवन-जीवन हमने जग में खेल यही होते देखा
धीरे-धीरे जीती दुनिया धीरे-धीरे हारे लोग

वक्त सिहासन पर बेठा है अपने राग सुनाता है
संगत देने को पाते है साँसों के इकतारे लोग

नेकी इक दिन काम आती है हमको क्या समझते हो
हमने बेबस मरते देखे कैसे प्यारे-प्यारे लोग

इक नगरी में क्यों मिलती है रोटी सपनो के बदले
जिनकी नगरी है वो जाने हम ठहरे बंजारे लोग
                                               - जावेद अख्तर 
मै पा न सका कभी इस खलिश से छुटकारा
वो मुझसे जीत भी सकता था जाने क्यों हारा
बरस के खुल गए आसू निथर गई है फिजा 
चमक रहा है सरे-शाम दर्द का तारा
किसी कि आँख से टपका था एक अमानत है
मेरी हथेली पे रक्खा हुआ ये अंगारा
जो पर समेटे तो एक शाख भी नहीं पाई 
खुले थे पर तो मेरा आसमान था सारा
वो साप छोड़ दे डसना ये मै भी कहता हु
मगर न छोड़ेंगे लोग उसको गर न पुकारा
                                 - जावेद अख्तर 
जहानतो को कहा कब्र से फरार मिला
जिसे निगाह मिली उसे इंतजार मिला
वो कोई रह का पत्त्थर हो या हसी मंजर
 जहा से रास्ता ठहरा वही मंजर मिला
कोई पुकार रहा था खुली फजाओ से
नजर उठाई तो चारो तरफ हिसार मिला
हर एक सांस न जाने थी जुस्तजू किसकी 
हर एक दायर मुसाफिर को बेदयार मिला
ये शहर है कि नुमाइश लगी हुई है कोई
जो आदमी भी मिला बनके इश्तहार मिला
                                   - निदा फाजली  
मायने 
जहानत - विवेक, कब्र - व्याकुलता, हिसार - घेरा, दयार- घर/स्थान , नुमाइश-प्रदशर्नी/दिखावा.

गम होते है तो जहानत होती है
दुनिया में हर शय कि कीमत होती है
अक्सर वो कहते है वो बस मेरे है
अक्सर क्यों कहते है हैरत होती है
तब हम दोनों वक्त चुराकर लेते थे
अब मिलते है जब भी फुर्सत होती है
अपनी महबूबा में अपनी माँ देखे 
बिन माँ के लडको कि फितरत होती है
एक कश्ती में एक कदम ही रखते है
कुछ लोगो कि ऐसी आदत होती है
                                  - जावेद अख्तर
ख्वाब के गाँव में पले है हम
पानी चलनी में ले चले है हम
छाछ फुके कि अपने बचपन में 
दूध से किस तरह जले है हम
खुद है अपने सफ़र कि दुश्वारी 
अपने पैरो के आबले है हम
तू तो मत कह हमें बुरा दुनिया
तुने ढाला है और ढले है हम
क्यों है कब तक है किसकी खातिर है
बड़े संजीदा मसले है हम
                         - जावेद अख्तर   
Taken By Devendra Gehlod At Ratnagiri
वो ढल रहा है तो ये भी रंगत बदल रही है
जमीं सूरज कि उंगलियों से फिसल रही है

जो मुझको जिन्दा जला रहे है वो बेखबर है
कि मेरी जंजीर धीरे-धीरे पिघल रही है

मै क़त्ल तो हो गया तुम्हारी गली में लेकिन
मेरे लहू से तुम्हारी दिवार गल रही है

न जलने पाते थे जिसके चूल्हे भी हर सवेरे
सुना है कल रात से वो बस्ती भी जल रही है

कभी तो इन्सान जिन्दगी कि करेगा इज्ज़त
ये एक उम्मीद आज भी दिल में पल रही है - जावेद अख्तर
आओ कही से
थोड़ी सी मिटटी भर लाए
मिटटी को बादल में गुंधे
नए नए आकर बनाए
किसी के सर पर चुटिया रख दे
माथे ऊपर तिलक सजाये
किसी के छोटे से चेहरे पर
मोटी सी दाढ़ी फैलाए
कुछ दिन उनसे जी बहलाए
और ये जब मैले हो जाए
दाढ़ी, चोटी, तिलक सभी को
तोड़-फोड़ के गडमड कर दे
मिली-जुली यह मिटटी फिर से
अलग-अलग सांचो में भर दे
दाढ़ी में चोटी लहराए
चोटी में दाढ़ी चुप जाए
किस्मे कितना कौन छुपा है
कौन बताए ? कौन बताए ?
                                    - निदा फाजली
इन्सान में हैवान यहाँ भी है वहा भी
अल्लाह निगहबान यहाँ भी है वहा भी

खूखार दरिंदो के फकत नाम अलग है
शहरो में बयाबान यहाँ भी है वहा भी

रहमत कि कुदरत हो या भगवान कि मूरत
हर खेल का मैदान यहाँ भी है वहा भी

हिन्दू भी मजे में है, मुसलमा भी मजे में
इन्सान परेशां यहाँ भी है वहा भी
                                                 निदा फाजली
हर कविता मुकम्मल  होती है
लेकिन वो कलम से
कागज पर जब आती है
थोड़ी सी कमी रह जाती है


हर प्रीत मुकम्मल होती है
लेकिन वो गगन से 
धरती पर जब आती है
थोड़ी सी कमी रह जाती है

हर जीत मुकम्मल होती है
सरहद से वो लेकिन 
आँगन में जब आती है
थोड़ी सी कमी रह जाती है

फिर कविता नई
फिर प्रीत नई
फिर जीत नई ... बहलाती है
हर बार मगर लगता है युही
थोड़ी सी कमी रह जाती है
                          -निदा फाजली
हमारे शौक कि ये इंतहा थी
कदम रक्खा कि मंजिल रास्ता थी

कभी जो ख्वाब था, वो पा लिया है
मगर जो खो गई, वो चीज़ क्या थी

मोह्हबत मर गई मुझको भी गम है
मिरे अच्छे दिनों कि आशना थी

जिसे छु लू मै, वो हो जाए सोना
तुझे देखा तो जाना बददुआ थी

मरीजे-ख्वाब को तो अब शिफा है
मगर दुनिया बड़ी कडवी दवा थी
                              - जावेद अख्तर   
खवाब इन आँखों से अब कोई चुराकर ले जाए
कब्र के सूखे हुए फुल उठाकर ले जाए

मुन्तजिर फुल में खुशबु कि तरह हु कब से
कोई झोके कि तरह आए उड़कर ले जाए

ये भी पानी है मगर आँखों का ऐसा पानी
जो हथेली से रची मेहंदी छुड़ाकर ले जाए

मै मोह्हबत से महकता हुआ ख़त हु, मुझको
जिन्दगी अपनी किताबो में छुपाकर ले जाए

खाक इंसाफ है नाबीना बुतों के आगे
रात थाली में चरागों को सजा कर ले जाए

उनसे कहना कि मै पैदल नहीं आने वाला
कोई बादल मुझे कंधे पे बिठाकर ले जाए
                                               बशीर बद्र  

गुलाबो कि तरह दिल अपना शबनम में भिगोते है
मुह्हबत करने वाले खुबसूरत लोग होते है

किसी ने जिस तरह अपने सितारों को सजाया है
गजल के रेशमी धागे में यु मोती पिरोते है

पुराने मौसमो के नामे-नामी मिटते जाते है
कही पानी, कही शबनम, कही आसू भिगोते है

यही अंदाज है मेरा समुन्दर फ़तह करने का
मेरी कागज कि कश्ती में कई जुगनू भी होते है

सुना है बद्र साहब महफ़िलो कि जान होते थे
बहुत दिनों से वो पत्थर है, न हँसते है न रोते है
                                                          बशीर बद्र  
सभी को गम है समुन्दर के खुश्क होने का
कि खेल ख़त्म हुआ किश्तिया डुबोने का

बढ़ाना जिस्म बगुलों का क़त्ल होता रहा
ख्याल भी नहीं आया किसी को रोने का

सिला कोई नहीं  परछाईयो कि पूजा का
मुआल कुछ नहीं ख्वाबो कि फसल बोने का

बिछड़ के तुझ से मझे यह गुमान होता है
कि मेरी आँखे है पत्थर कि, जिस्म सोने का

हुजूम देखता हु जब, तो काप उठता हु
अगरचे खोफ नहीं अब किसी को खोने का
                                           - शहरयार
मै इस उम्मीद पे डूबा की तू बचा लेगा
अब इसके बाद मेरा इम्तिहान क्या लेगा

ये एक मेला है वादा किसी से क्या लेगा
ढलेगा दिन तो हर एक अपना रास्ता लेगा

मै बुझ गया तो हमेशा को बुझ ही जाउगा
कोई चराग नहीं हु कि फिर जला लेगा

कलेजा चाहिए दुश्मन से दुश्मनी के लिए
जो बे-अमल है वो बदला किसी से क्या लेगा

मै उसका हो नहीं सकता बता न देना उसे
लकीरे हाथ कि अपनी वो सब जला देगा

हजार तोड़के आ जाओ उससे रिश्ता वसीम
मै जनता हु वो जब चाहेगा बुला लेगा-  वसीम बेरलवी
ये जो है हुक्म, मेरे पास न आए कोई,
इसलिए रूठ रहे है की मनाए कोई

ये न पूछो की गेम-हिज्र में कैसी गुजरी
दिल दिखने को हो तो दिखाए कोई

हो चूका ऐश का जलसा, तो मुझे ख़त पंहुचा
आपकी तरह से मेहमान बुलाए कोई

क्यों वो मय दाखिले-दावत ही नहीं वाइज
महरबानी से बुला कर जो पिलाये कोई

आपने दाग को मुह भी न लगाया, अफ़सोस
उसको लगता था, कलेजे से लगाये कोई
                                                  - दाग देहलवी
परिंदे अब भी पर तोले हुए है
हवा में सनसनी घोले हुए है

तुम्ही कमजोर पड़ते जा रहे हो
तुम्हारे ख्वाब तो शोले हुए है

गज़ब है सच को सच नहीं कहते वो
कुरान-ओ-उपनिषद खोले हुए है

मजारो से दुआए मांगते हो
अकीदे किस कदर पोले हुए है

चढ़ाता फिर रहा हु, जो चढ़ावे
तुम्हारे नाम पर बोले हुए है
                                     - दुष्यंत कुमार
मायने
अक़ीदे=आस्थाए
हम कुछ ऐसे तेरे दीदार में खो जाते है
जैसे बच्चे भरे बाज़ार में खो जाते है

मुस्तकिल जूझना यादो से बहुत मुश्किल है
रफ्ता-रफ्ता सभी घरबार में खो जाते है

इतना सासों की रफाकत पे भरोसा न करो
सब के सब मिटटी के अम्बार में खो जाते है

मेरी खुद्दारी ने अहसान किया है
मुझ पर वर्ना जो जाते है, दरबार में खो जाते है

कौन फिर ऐसे में तनकीद करेगा तुझ पर
सब तेरे जुब्बा-ओ-दस्तार में खो जाते है
                                          -मुनव्वर राणा
मायने
मुस्तकिल=निरंतर, रफाकत=साथ, तनकीद=आलोचना, जुब्बा-ओ-दस्तार=शाही पहनावा 
जाने कितनी उड़ान बाकी है !
इस परिंदे में जान बाकी है !!

जितनी बाटनी थी,बट चुकी ये जमी !
अब तो बस आसमान बाकी है !!

अब वो दुनिया अजीब लगती है !
जिसमे अमनो-अमन बाकी है !!

इम्तिहा से गुजर के क्या देखा !
एक नया इम्तहान बाकी है !!

सर कलम होंगे कल यहाँ उनके !
जिनके मुह में जुबान बाकी है !!
                                             राजेश रेड्डी 
जिन्दगी तुने लहू ले के दिया कुछ भी नहीं !
तेरे दामन में मेरे वास्ते क्या कुछ भी नहीं !!

आप इन हाथो कि चाहे तो तलाशी ले ले !
मेरे हाथो में लकीरों के सिवा कुछ भी नहीं !!

हमने देखा है कई ऐसे खुदाओ को यहाँ !
सामने जिनके वो सचमुच का खुदा कुछ भी नहीं !!

ये अलग बात है वो रास न आया खुद को !
उस भले शख्स में वैसे तो बुरा कुछ भी नहीं !!

बाते फैली है मेरे नाम से जाने क्या-क्या !
जबकि सच ये है कि मैंने तो कहा कुछ भी नहीं !!

या खुदा! अब ये किस रंग में आई है बहार !
जर्द ही जर्द है पेड़ो पे हरा कुछ भी नहीं !!

दिल भी एक बच्चे कि मानिंद अड़ा है जिद पर !
या तो सब कुछ इसे चाहिए या कुछ भी नहीं !!
                                                                  राजेश रेड्डी 
में जिन्दा हु यह मुश्तहर कीजिये !
मेरे कातिलो को खबर कीजिये !!

जमी सख्त है, आसमा दूर है !
बसर हो सके तो बसर कीजिये !!

सितम के बहुत से है रद्दे अमल !
जरुरी नहीं चस्म तर कीजिये !!

वही जुल्म बारे दीगर है तो फिर !
वही जुल्म बारे दीगर कीजिये !!

कफ़स तोडना बाद की बात है !
अभी ख्वाहिसे बालो पर कीजिये !!
                          - साहिर लुधियानवी
मायने 
मुस्तहर=प्रचारित, रद्दे अमल= प्रतिक्रिया, चस्मतर= आँखे भीगना, बारे दीगर= दूसरी बार, कफ़स=पिंजरा, ख्वाहिसे बालो पर= उड़ान की ख्वाहिश 
चौक चौक उठती है महलों की फिजा रात गए
कौन देता है ये गलियों में सदा रात गए
ये हकाइक की चट्टानों से तराशी दुनिया
ओढ़ लेती है तिलिस्मो की रिदा रात गए
चुभ के रह जाती है सीने में बदन की खुशबु
खोल देता है कोई बंद-ऐ-कबा रात गए
आओ हम जिस्म की शम्मा से उजाला कर ले
चाँद निकला भी तो निकलेगा जरा रात गए
तू न अब आए तो क्या, आज तलक आती है
सीडीओ  से तेरे कदमो की सदा रात गए
                                                 जा निसार अख्तर
हकाईक=सच्चाई, बंद-ऐ-कबा = अंगरखा, रिदा=चादर
अक्से-खुशबु हु, बिखरने से न रोए कोई,
और बिखर जाऊ तो मुझको न समेटे कोई !
काँप उठती हु मै यह सोचकर तन्हाई में
मेरे चेहरे पे तेरा नाम न पढ़ ले कोई !
जिस तरह ख्वाब मेरे हो गए रेजा-रेजा,
इस तरह से न कभी टूट के बिखरे कोई !
अब तो इस राह से वो शख्स गुजरता भी नहीं,
अब किस उम्मीद पे दरवाजे से झाके कोई !
कोई आह्ट, कोई आवाज, कोई चाह नहीं 
 दिल की गलिया बड़ी सुनी है, आए कोई !
                                                    परवीन शाकिर
तुम्हारा दिल मेरे दिल के बराबर हो नहीं सकता
वह शीशा हो नहीं सकता यह पत्थर हो नहीं सकता
कभी नासेह की सुन लेता हु फिर बरसो तडपता हु
कभी होता है मुझसे सब्र अक्सर हो नहीं सकता
यह मुमकिन है की तुझ पर हो भी जाये अख्तियार अपना
मगर काबू हमारा अपने दिल पे हो नहीं सकता
जफ़ाए झेल कर आशिक करे माशूक को जालिम
वगरना बेसबब कोई सितमगर हो नहीं सकता
जफ़ाए दाग पर करते है वह यह भो समझते है
की ऐसा आदमी मुझको मय्यसर हो नहीं सकता
                                                               दाग देहलवी 

बेसन की सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ
याद आती है चोका बासन, चिमटा फुकनी जैसी माँ
चीड़ो की चाहकर में गूंजे राधामोहन अली अली
मुर्गे की आवाज से खुलती घर की कुण्डी जैसी माँ
बाण की खुर्री ख़त के ऊपर हर आहात पर कान धरे 
आधी सोई आधी जगी भरी दोपहरी जैसी माँ
बीवी, बेटी, बहन, पड़ोसन थोड़ी थोड़ी सी सब में,
दिन भर एक रस्सी के ऊपर चलती नटनी जैसी माँ
बात के अपना चेहरा, माथा, आँखे जाने कहा गई
फटे पुराने एक एलबम में चंचल लड़की जैसी माँ
                                                        -  निदा फाजली

ऐ मुसाफिरे-तन्हा, शाम होने वाली है
जल्द लौट के घर जा, शाम होने वाली है

बैठने लगे आकर क्या परिंदे शाखों पर
देख रक्स पेड़ो का, शाम होने वाली है

आज पाँव के नीचे कोई शय ज़मी सी है
आज क्या गजब होगा, शाम होने वाली है

रेत के समुन्दर में एक नाव कागज की
कैसे सच हुआ सपना, शाम होने वाली है

धुंध के दरीचे भी बंद होने वाले है
भूल जा की क्या देखा, शाम होने वाली है - शहरयार खान

Roman
ae musafir tanha, shaam hone wali hai
jald lout ke ghar ja, shaam hone wali hai

baithne lage aakar kya parinde shaakho par
dekh raks pedo ka, shaam hone wali hai

aaj paanv ke niche koi shay jami si hai
aaj kya ghazab hoga, shaam hone wali hai

ret ke samundar me ek naav kaagaj ki
kaise sach hua sapna, shaam hone wali hai

dhundh ke dariche bhi band hone wale hai
bhul jaa ki kya dekha, shaam hone wali hai - Shaharyaar Khaan
ये जीने की कैसी सजा दी गई
हवाओ के रुख पर उड़ा दी गई

किसी पैरहन पर मुन्नकश हुई
किसी आईने में सजा दी गई

किसी जिन्दगी से जुदा करके मै
किसी जिन्दगी से मिला दी गई

किसी घर से मुझको उठाया गया
किसी घर में लाकर बिठा दी गई

जहा जी में आया है रखा मुझे
जहा से भी चाहा हटा दी गई

हास्य गया उम्रभर यु मुझे
हसी ही हसी में रुला दी गई- शाहिदा हसन

जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है
माँ दुआ करती हुई ख्वाब में आ जाती है

ये ऐसा कर्ज है की जो में अदा कर ही नहीं सकता
में जब तक घर न लौटू मेरी माँ सजदे में रहती है

ऐ अँधेरे देख ले, मुह तेरा काला हो गया
माँ ने आखे खोल दी, घर में उजाला हो गया

अभी जिन्दा है माँ मेरी, मुझे कुछ भी नहीं होगा,
में घर से जब निकलता हु, दुआ भी साथ चलती है

मुनव्वर माँ के आगे यु कभी खुलकर नहीं रोना,
जहा बुनियाद हो,इतनी नमी अच्छी नहीं होती - मुनव्वर राणा
Roman
jab bhi kashti meri sailab me aa jati hai
maa duaa karti hui khwab me aa jati hai

ye aisa karj hai ki jo mai ada kar hi nahi sakta
mai jab tak ghar n loutu, meri maa sajde me rahti hai

ae andhere dekh le, muh tera kala ho gaya
maa ne aakhe khol di, ghar me ujala ho gya

abhi jinda hai maa meri, mujhe kuch nahi hoga,
mai ghar se jab niklata hu, duaa bhi saath chalti hai

munwwar maa ke aage yu kabhi khulkar nahi rona,
jaha buniyad ho, itni nami achchi nahi hoti- Munwwar Rana
हजरत अल्लामा सर शेख मोहम्मद "इक़बाल 09, नवम्बर, 1877 ई. को सियालकोट में पैदा हुए. वह कश्मीरी ब्राम्हण थे. उनके पूर्वज कश्मीर से पंजाब आये थे उनके पिता एक अच्छे सूफी संत थे. उनकी माता ने उनका नाम "मोहम्मद इक़बाल" रखा था | घर पर प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद कुछ समय तक आपने 'मकतब' में पढ़ा, फिर स्कूल में प्रवेश लिया |
आप स्काच मिशन कॉलेज स्यालकोट से F.A. पास करके लाहौर आये | 1892 में B. A. और 1899 में M. A. पास किया | इकबाल को प्रारंभ से ही शिक्षा, ज्ञान प्राप्त करने का शौक था अथ आप 1905 में उच्च शिक्षा के लिए इंग्लॅण्ड गए | Cambridge विश्वविद्यालय (जर्मनी) से फिलासफी ऑफ़ इरान पर एक उच्च श्रेणी का लेख लिखकर P.H. D. की डिग्री प्राप्त की और फिर बेरिस्त्री की परीक्षा भी पास की |
विलायत से वापस आने के पश्चात् आपने कुछ समय प्रोफेसरी करके नौकरी से मुक्ति प्राप्त कर बेरिस्टरी शुरू की | 1926 से आप ने राजनीति में भाग लेना शुरू किया, 1931 व 1932 में दूसरी और तीसरी गोल मेज़ कान्फरेंस में भाग लेने के लिए इंग्लॅण्ड की यात्रा की | 1922 में आपको 'सर' की उपाधि से सम्मानित किया गया |
1855 से पूरब के सबसे बड़े शायर और फलसफी इकबाल की रचनाओ के चर्चे भारत के ऊँचे-ऊँचे पहाड़ो और समुद्रो से गुजर कर इंग्लॅण्ड, जर्मनी और इरान के साहित्यिक वर्गो में पहुचने लगे थे | इकबाल ने भारत की आज़ादी और क्रन्तिकारी भावनाओ को भी अपनी कविताओ का एक अंग बना लिया था |
अल्लामा 'इक़बाल ने जिन स्त्रोतों से लाभ उठाया है उन में सबसे पहला नाम मौलाना 'रूमी' का है | 'ग़ालिब' ( Mirza Ghalib ) और जर्मन शायर 'गोयटे' ने भी इक़बाल को बहुत प्रभावित किया है. उनकी प्राम्भिक रचनाओ में प्रेम और बुद्धि का प्रयोग अधिकता से हुआ है. अल्लामा 'इक़बाल' बहुत खूब व्यक्ति थे कोमलता, सहनशीलता, फकीर दोस्ती और भलाई की भावना उनमे बहुत थी. वे एक रहम दिल और अमन पसंद व्यक्ति थे | उर्दू फारसी के इस प्रसिद्ध फलसफी शायर की मृत्यु 60 वर्ष की आयु में  21 अप्रेल, १९३८ को हुई और बादशाही मस्जिद लाहौर के बराबर में दफ़न हुए |
दाग देहलवी जिनका वास्तविक नाम नवाब मिर्ज़ा खां था का जन्म २५ मई, १८३१ को दिल्ली में हुआ | जब दाग़ पाँच-छह वर्ष के थे तभी इनके पिता मर गए। इनकी माता ने बहादुर शाह "ज़फर" के पुत्र मिर्जा फखरू से विवाह कर लिया | तब वे भी दिल्ली में लाल किले में रहने लगे | यहाँ दाग को हर तरह की शिक्षा मिली और यहाँ वे शायरी करने लगे और जौक को अपना गुरु बनाया | सन 1856 में मिर्जा फखरू की मृत्यु हो गई और दूसरे ही वर्ष बलवा आरंभ हो गया, जिससे यह रामपुर चले गए | वहाँ युवराज नवाब कल्ब अली खाँ के आश्रय में रहने लगे। सन् 1887 ई. में नवाब की मृत्यु हो जाने पर ये रामपुर से दिल्ली चले आए। घूमते हुए दूसरे वर्ष हैदराबाद पहुचे | पुन: निमंत्रित हो सन् 1890 ई. में दाग़ हैदराबाद गए और निज़ाम के शायरी के उस्ताद नियत हो गए। इन्हें यहाँ धन तथा सम्मान दोनों मिला | यहीं सन् 1905 ई. में फालिज से इनकी मृत्यु हुई। दाग़ शीलवान, विनम्र, विनोदी तथा स्पष्टवादी थे और सबसे प्रेमपूर्वक व्यवहार करते थे।
उनके जीवन का अधिकांश समय दिल्ली में व्यतीत हुआ था, यही कारण है कि उनकी शायरी में दिल्ली की तहजीब नज़र आती है। दाग़ देहलवी की शायरी इश्क़ और मोहब्बत की सच्ची तस्वीर पेश करती है।
गुलजारे-दाग़, आफ्ताबे-दाग़, माहताबे-दाग़ तथा यादगारे-दाग़ इनके चार दीवान हैं, जो सभी प्रकाशित हो चुके हैं। 'फरियादे-दाग़', इनकी एक मसनवी (खंडकाव्य) है। इनकी शैली सरलता और सुगमता के कारण विशेष लोकप्रिय हुई। भाषा की स्वच्छता तथा प्रसाद गुण होने से इनकी कविता अधिक प्रचलित हुई पर इसका एक कारण यह भी है कि इनकी शायरी कुछ सुरुचिपूर्ण भी है।
मुग़ल बादशाह शाहआलम, जो कि अन्धा हो चुका था, उसके आखिरी ज़माने में पठानों का एक ख़ानदान समरकंद से अपनी रोजी-रोटी की तलाश में भारत आया था। यह ख़ानदान कुछ महीने तक ज़मीन-आसमान की खोज में इधर-उधर भटकता रहा और फिर दिल्ली के एक मोहल्ले बल्लीमारान में बस गया। इस ख़ानदान की दूसरी पीढ़ी के एक नौजवान अहमद बख़्श ख़ाँ नेअलवर के राजा बख़्तावर सिंह के उस फौजी दस्ते की सरदारी का फ़र्ज़ निभाया, जो राजा की और से भरतपुर के राजा के ख़िलाफ़ अंग्रेज़ों की मदद के लिए भेजा गया था। लड़ाई के मैदान में अहमद बख़्श ख़ाँ ने अपनी जान को दाँव पर लगाकर एक अंग्रेज़ की जान बचाई थी। उसकी इस वफ़ादारी के लिए लॉर्ड लेक उसे फ़िरोजपुर और झरका की जागीरें इनाम में दे दी |
अहमद बख़्श ख़ाँ का बड़ा लड़का शम्सुद्दीन ख़ाँ, जो उसकी अलवर की मेवातन बीवी का बेटा था, उसने जागीर में नाइंसाफ़ी के लिए अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई। वह ब्रिटिश रेजिडेंट के क़त्ल की भी साजिश रचने लगा। लेकिन उसकी इस साजिश का पता अंग्रेज़ सरकार को लग गया और उसे 1835 ई. में फाँसी दे दी गई। दाग़ देहलवी इसी शम्सुद्दीन ख़ाँ की पहली और अंतिम संतान थे, जो बाद में उर्दू ग़ज़ल के इतिहास में नवाब मिर्ज़ा ख़ाँ दाग़ देहलवी के नाम से प्रसिद्ध हुए। अपने पिता की फाँसी के समय दाग़ देहलवी मात्र चार साल और चार महीने के थे। अंग्रेज़ों के भय से दाग़ देहलवी की माँ वजीर बेगम कई वर्षों तक छिप कर रहीं और इस दौरान दाग़ देहलवी अपनी मौसी के जहाँ रहे ।
कई वर्षों के भटकाव के बाद जब वजीर बेगम ने आखिरी मुग़ल बादशाह बहादुरशाह ज़फर के पुत्र और उत्तराधिकारी मिर्ज़ा फ़ख़रू से विवाह कर लिया, तब दाग़ देहलवी भी लाल क़िले में रहने लगे। यहाँ इनकी शिक्षा-दीक्षा आदि का अच्छा प्रबन्ध हो गया था। दाग़ देहलवी ने लाल क़िले में बारह वर्ष बिताए, लेकिन यह सब विलासिता मिर्ज़ा फ़ख़रू के देहांत के बाद इनके पास नहीं रही। बूढ़े बादशाह बहादुरशाह ज़फर की जवान मलिका जीनतमहल की राजनीति ने लाल क़िले में उन्हें रहने नहीं दिया। इस बार उनके साथ उनकी माता वजीर बेगम और साथ ही माता की कुछ जायज़ और नाजायज़ संताने भी थीं। मिर्ज़ा फ़ख़रू से मिर्ज़ा मोहम्मद खुर्शीद के अतिरिक्त, आगा तुराब अली से, जिनके यहाँ वजीर बेगम शम्सुद्दीन ख़ाँ की फाँसी के बाद कुछ दिन छुपी थीं आगा मिर्ज़ा शगिल और जयपुर के एक अंग्रेज़ से भी एक लड़का अमीर मिर्ज़ा और एक लड़की बादशाह बेगम शामिल थीं।