कोई उम्मीद बर नहीं आती !
कोई सूरत नज़र नहीं आती !!
मौत का एक दिन मुअय्यन है !
नींद क्यों रात भर नहीं आती !!
आगे आती थी हाले-दिल पर हसी !
अब किसी बात पर नहीं आती !!
जानता हू सवाबे-ताअतो-जुहद !
पर तबियत इधर नहीं आती !!
है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हू !
वरना क्या बात कर नहीं आती ?
क्यों न चीखू कि याद करते है !
मेरी आवाज़ गर नहीं आती !!
हम वहा है जहा से हमको भी !
कुछ हमारी खबर नहीं आती !!
मरते है आरजू में मरने कि !
मौत आती है पर नहीं आती !!
कबा किस मुह से जाओगे ग़ालिब !
शर्म तुमको मगर नहीं आती !!
- ग़ालिब
मायने
मुअय्यन = नियत, सवाबे-ताअतो-जुहद = संयम तथा उपासना
दर्द - ग़ालिब
दिले नादां तुझे हुआ क्या है ?
आखिर इस दर्द कि दवा क्या है ?
हम है मुश्ताक और वो बेजार !
या इलाही ये माजरा क्या है ?
मै भी मुह मै जुबान रखता हू !
काश ! पूछो कि मुद्दआ क्या है ?
जबकि तुझ बिन नहीं कोई मोजूद !
फिर ये हंगामा ऐ खुदा ! क्या है ?
ये परी-चेहरा लोग कैसे है ?
गमजा-ओ-इशवा-ओ-अदा क्या है ?
सब्जा-ओ-गुल कहा से आए है ?
अब्रा क्या चीज़ है, हवा क्या है ?
हमको उनसे वफ़ा कि है उम्मीद !
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है ?
हां, भला कर तेरा भला होगा !
दरवेश कि सदा क्या है ?
जान तुम पर निसार करता हू !
मै नहीं जानता दुआ क्या है ?
मैंने माना कि कुछ नहीं ग़ालिब !
मुफ्त हाथ आए तो बुरा क्या है ?
- ग़ालिब
मायने
मुश्ताक = उत्सुक, गमजा-ओ-इशवा-ओ-अदा = नाज और अदा,
सब्जा-ओ-गुल = पत्ते/फूल, अब्र = बादल, सदा = फकीर की आवाज़
वो शाम जैसे किसी से बिछड के रोयी थी - बशीर बद्र
हर इक चिराग कि लो ऐसी सोई-सोई थी
वो शाम जैसे किसी से बिछड के रोयी थी
नहा गया थे मै कल जुगनुओ कि बारिश में
वो मेरे कंधे पे सर रख के खूब रोयी थी
कदम-कदम पे लहू के निशान ऐसे कैसे है
ये सरजमी तो मेरे आंसुओ ने धोयी थी
मकाँ के साथ वो पोधा भी जल गया जिसमे
महकते फूल थे फूलो में एक तितली थी
खुद उसके बाप ने पहचान कर न पहचाना
वो लड़की पिछले फसादात में जो खोयी थी
- बशीर बद्र
वो शाम जैसे किसी से बिछड के रोयी थी
नहा गया थे मै कल जुगनुओ कि बारिश में
वो मेरे कंधे पे सर रख के खूब रोयी थी
कदम-कदम पे लहू के निशान ऐसे कैसे है
ये सरजमी तो मेरे आंसुओ ने धोयी थी
मकाँ के साथ वो पोधा भी जल गया जिसमे
महकते फूल थे फूलो में एक तितली थी
खुद उसके बाप ने पहचान कर न पहचाना
वो लड़की पिछले फसादात में जो खोयी थी
- बशीर बद्र
मायने
फसादात-दंगो
मुझे सुकून घने जंगलो में मिलता है - बशीर बद्र
गजल को माँ कि तरह बावकार करता हू
मै ममता के कटोरों में दूध भरता हू
ये देख हिज्र तेरा कितना खुबसूरत है
अजीब मर्द हू. सोलह-सिंगार करता हू
बदन समेट के ले जाये जैसे शाम कि धुप
तुम्हारे शहर से मै इस तरह गुजरता हू
तमाम दिन का सफ़र करके रोज शाम के बाद
पहाडियों से घिरी कब्र में उतरता हू
मुझे सुकून घने जंगलो में मिलता है
मै रास्तो से नहीं मंजिलो से डरता हू
- बशीर बद्र
मायने
बावकार-प्रतिष्ठित
मै ममता के कटोरों में दूध भरता हू
ये देख हिज्र तेरा कितना खुबसूरत है
अजीब मर्द हू. सोलह-सिंगार करता हू
बदन समेट के ले जाये जैसे शाम कि धुप
तुम्हारे शहर से मै इस तरह गुजरता हू
तमाम दिन का सफ़र करके रोज शाम के बाद
पहाडियों से घिरी कब्र में उतरता हू
मुझे सुकून घने जंगलो में मिलता है
मै रास्तो से नहीं मंजिलो से डरता हू
- बशीर बद्र
मायने
बावकार-प्रतिष्ठित
अपनी उदास धुप तो घर-घर चली गयी - बशीर बद्र

ये रौशनी लकीर के बाहर चली गयी
नीला-सफ़ेद कोट-जमीं पर बिछा दिया
फिर मुझको आसमान पे लेकर चली गयीकब तक झुलसती रेत पे चलती तुम्हारे साथ
दरिया कि मौज, दरिया के अन्दर चली गयी
हम लोग ऊँचे पुल के निचे खड़े रहे
उल्टा था बल्ब रौशनी ऊपर चली गयी
लहरों ने घेर रखा था सारे मकान को
मछली किधर से कमरे के अन्दर चली गयी
- बशीर बद्र
उम्मीद - ग़ालिब
कोई उम्मीद बर नहीं आती !
कोई सूरत नज़र नहीं आती !!
मौत का एक दिन मुअय्यन है !
नींद क्यों रात भर नहीं आती !!
आगे आती थी हाले-दिल पर हसी !
अब किसी बात पर नहीं आती !!
जानता हू सवाबे-ताअतो-जुहद !
पर तबियत इधर नहीं आती !!
है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हू !
वरना क्या बात कर नहीं आती ?
क्यों न चीखू कि याद करते है !
मेरी आवाज़ गर नहीं आती !!
हम वहा है जहा से हमको भी !
कुछ हमारी खबर नहीं आती !!
मरते है आरजू में मरने कि !
मौत आती है पर नहीं आती !!
कबा किस मुह से जाओगे ग़ालिब !
शर्म तुमको मगर नहीं आती !!
- ग़ालिब
मायने
मुअय्यन = नियत, सवाबे-ताअतो-जुहद = संयम तथा उपासना
कोई सूरत नज़र नहीं आती !!
मौत का एक दिन मुअय्यन है !
नींद क्यों रात भर नहीं आती !!
आगे आती थी हाले-दिल पर हसी !
अब किसी बात पर नहीं आती !!
जानता हू सवाबे-ताअतो-जुहद !
पर तबियत इधर नहीं आती !!
है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हू !
वरना क्या बात कर नहीं आती ?
क्यों न चीखू कि याद करते है !
मेरी आवाज़ गर नहीं आती !!
हम वहा है जहा से हमको भी !
कुछ हमारी खबर नहीं आती !!
मरते है आरजू में मरने कि !
मौत आती है पर नहीं आती !!
कबा किस मुह से जाओगे ग़ालिब !
शर्म तुमको मगर नहीं आती !!
- ग़ालिब
मायने
मुअय्यन = नियत, सवाबे-ताअतो-जुहद = संयम तथा उपासना
दर्द - ग़ालिब
दिले नादां तुझे हुआ क्या है ?
आखिर इस दर्द कि दवा क्या है ?
हम है मुश्ताक और वो बेजार !
या इलाही ये माजरा क्या है ?
मै भी मुह मै जुबान रखता हू !
काश ! पूछो कि मुद्दआ क्या है ?
जबकि तुझ बिन नहीं कोई मोजूद !
फिर ये हंगामा ऐ खुदा ! क्या है ?
ये परी-चेहरा लोग कैसे है ?
गमजा-ओ-इशवा-ओ-अदा क्या है ?
सब्जा-ओ-गुल कहा से आए है ?
अब्रा क्या चीज़ है, हवा क्या है ?
हमको उनसे वफ़ा कि है उम्मीद !
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है ?
हां, भला कर तेरा भला होगा !
दरवेश कि सदा क्या है ?
जान तुम पर निसार करता हू !
मै नहीं जानता दुआ क्या है ?
मैंने माना कि कुछ नहीं ग़ालिब !
मुफ्त हाथ आए तो बुरा क्या है ?
- ग़ालिब
मायने
मुश्ताक = उत्सुक, गमजा-ओ-इशवा-ओ-अदा = नाज और अदा,
सब्जा-ओ-गुल = पत्ते/फूल, अब्र = बादल, सदा = फकीर की आवाज़
वो शाम जैसे किसी से बिछड के रोयी थी - बशीर बद्र
हर इक चिराग कि लो ऐसी सोई-सोई थी
वो शाम जैसे किसी से बिछड के रोयी थी
नहा गया थे मै कल जुगनुओ कि बारिश में
वो मेरे कंधे पे सर रख के खूब रोयी थी
कदम-कदम पे लहू के निशान ऐसे कैसे है
ये सरजमी तो मेरे आंसुओ ने धोयी थी
मकाँ के साथ वो पोधा भी जल गया जिसमे
महकते फूल थे फूलो में एक तितली थी
खुद उसके बाप ने पहचान कर न पहचाना
वो लड़की पिछले फसादात में जो खोयी थी
- बशीर बद्र
वो शाम जैसे किसी से बिछड के रोयी थी
नहा गया थे मै कल जुगनुओ कि बारिश में
वो मेरे कंधे पे सर रख के खूब रोयी थी
कदम-कदम पे लहू के निशान ऐसे कैसे है
ये सरजमी तो मेरे आंसुओ ने धोयी थी
मकाँ के साथ वो पोधा भी जल गया जिसमे
महकते फूल थे फूलो में एक तितली थी
खुद उसके बाप ने पहचान कर न पहचाना
वो लड़की पिछले फसादात में जो खोयी थी
- बशीर बद्र
मायने
फसादात-दंगो
मुझे सुकून घने जंगलो में मिलता है - बशीर बद्र
गजल को माँ कि तरह बावकार करता हू
मै ममता के कटोरों में दूध भरता हू
ये देख हिज्र तेरा कितना खुबसूरत है
अजीब मर्द हू. सोलह-सिंगार करता हू
बदन समेट के ले जाये जैसे शाम कि धुप
तुम्हारे शहर से मै इस तरह गुजरता हू
तमाम दिन का सफ़र करके रोज शाम के बाद
पहाडियों से घिरी कब्र में उतरता हू
मुझे सुकून घने जंगलो में मिलता है
मै रास्तो से नहीं मंजिलो से डरता हू
- बशीर बद्र
मायने
बावकार-प्रतिष्ठित
मै ममता के कटोरों में दूध भरता हू
ये देख हिज्र तेरा कितना खुबसूरत है
अजीब मर्द हू. सोलह-सिंगार करता हू
बदन समेट के ले जाये जैसे शाम कि धुप
तुम्हारे शहर से मै इस तरह गुजरता हू
तमाम दिन का सफ़र करके रोज शाम के बाद
पहाडियों से घिरी कब्र में उतरता हू
मुझे सुकून घने जंगलो में मिलता है
मै रास्तो से नहीं मंजिलो से डरता हू
- बशीर बद्र
मायने
बावकार-प्रतिष्ठित
अपनी उदास धुप तो घर-घर चली गयी - बशीर बद्र

ये रौशनी लकीर के बाहर चली गयी
नीला-सफ़ेद कोट-जमीं पर बिछा दिया
फिर मुझको आसमान पे लेकर चली गयीकब तक झुलसती रेत पे चलती तुम्हारे साथ
दरिया कि मौज, दरिया के अन्दर चली गयी
हम लोग ऊँचे पुल के निचे खड़े रहे
उल्टा था बल्ब रौशनी ऊपर चली गयी
लहरों ने घेर रखा था सारे मकान को
मछली किधर से कमरे के अन्दर चली गयी
- बशीर बद्र
अनोखा प्यार - मीना कुमारी
जब चाहा इकरार किया, जब चाहा इनकार किया
देखो, हमने खुद ही से, कैसा अनोखा प्यार किया
ऐसा अनोखा, ऐसा तीखा, जिसको कोई सह न सके
हम समझे पत्ती-पत्ती को हमने सरशार किया
रूप अनोखे मेरे है और रूप ये तुने देखे है
मैंने चाहा, कर भी दिखाया, जंगल को गुलजार किया
दर्द तो होता रहता है, दर्द के दिन ही प्यारे है
जैसे तेज छुरी को हमने रह-रहकर फिर धार किया
काले चेहरे, कली खुशबू, सबको हमने देखा है
अपनी आँखों से इन सबको, शर्मिंदा हर बार किया
रोते दिल हँसते चेहरों को कोई भी न देख सका
आंसू पी लेने का वादा, हां सबने हर बार किया
कहने जैसी बात नहीं है, बात तो बिलकुल सादा है
दिल ही पर कुर्बान हुए, और दिल ही को बीमार किया
शीशे टूटे या दिल टूटे खुश्क लबो पर मौत लिए
जो कोई भी कर न सका वह हमने आख़िरकार किया
"नाज़" तेरे जख्मी हाथो ने जो भी किया अच्छा ही किया
तुने सब कि मांग सजी, हर इक का सिंगार किया
- मीना कुमारी
मायने- सरशार=उन्मत
आपको बता दे मीना कुमारी जी "नाज" तखल्लुस से लिखती थी
देखो, हमने खुद ही से, कैसा अनोखा प्यार किया
ऐसा अनोखा, ऐसा तीखा, जिसको कोई सह न सके
हम समझे पत्ती-पत्ती को हमने सरशार किया
रूप अनोखे मेरे है और रूप ये तुने देखे है
मैंने चाहा, कर भी दिखाया, जंगल को गुलजार किया
दर्द तो होता रहता है, दर्द के दिन ही प्यारे है
जैसे तेज छुरी को हमने रह-रहकर फिर धार किया
काले चेहरे, कली खुशबू, सबको हमने देखा है
अपनी आँखों से इन सबको, शर्मिंदा हर बार किया
रोते दिल हँसते चेहरों को कोई भी न देख सका
आंसू पी लेने का वादा, हां सबने हर बार किया
कहने जैसी बात नहीं है, बात तो बिलकुल सादा है
दिल ही पर कुर्बान हुए, और दिल ही को बीमार किया
शीशे टूटे या दिल टूटे खुश्क लबो पर मौत लिए
जो कोई भी कर न सका वह हमने आख़िरकार किया
"नाज़" तेरे जख्मी हाथो ने जो भी किया अच्छा ही किया
तुने सब कि मांग सजी, हर इक का सिंगार किया
- मीना कुमारी
मायने- सरशार=उन्मत
आपको बता दे मीना कुमारी जी "नाज" तखल्लुस से लिखती थी
अनोखा प्यार - मीना कुमारी
जब चाहा इकरार किया, जब चाहा इनकार किया
देखो, हमने खुद ही से, कैसा अनोखा प्यार किया
ऐसा अनोखा, ऐसा तीखा, जिसको कोई सह न सके
हम समझे पत्ती-पत्ती को हमने सरशार किया
रूप अनोखे मेरे है और रूप ये तुने देखे है
मैंने चाहा, कर भी दिखाया, जंगल को गुलजार किया
दर्द तो होता रहता है, दर्द के दिन ही प्यारे है
जैसे तेज छुरी को हमने रह-रहकर फिर धार किया
काले चेहरे, कली खुशबू, सबको हमने देखा है
अपनी आँखों से इन सबको, शर्मिंदा हर बार किया
रोते दिल हँसते चेहरों को कोई भी न देख सका
आंसू पी लेने का वादा, हां सबने हर बार किया
कहने जैसी बात नहीं है, बात तो बिलकुल सादा है
दिल ही पर कुर्बान हुए, और दिल ही को बीमार किया
शीशे टूटे या दिल टूटे खुश्क लबो पर मौत लिए
जो कोई भी कर न सका वह हमने आख़िरकार किया
"नाज़" तेरे जख्मी हाथो ने जो भी किया अच्छा ही किया
तुने सब कि मांग सजी, हर इक का सिंगार किया
- मीना कुमारी
मायने- सरशार=उन्मत
आपको बता दे मीना कुमारी जी "नाज" तखल्लुस से लिखती थी
देखो, हमने खुद ही से, कैसा अनोखा प्यार किया
ऐसा अनोखा, ऐसा तीखा, जिसको कोई सह न सके
हम समझे पत्ती-पत्ती को हमने सरशार किया
रूप अनोखे मेरे है और रूप ये तुने देखे है
मैंने चाहा, कर भी दिखाया, जंगल को गुलजार किया
दर्द तो होता रहता है, दर्द के दिन ही प्यारे है
जैसे तेज छुरी को हमने रह-रहकर फिर धार किया
काले चेहरे, कली खुशबू, सबको हमने देखा है
अपनी आँखों से इन सबको, शर्मिंदा हर बार किया
रोते दिल हँसते चेहरों को कोई भी न देख सका
आंसू पी लेने का वादा, हां सबने हर बार किया
कहने जैसी बात नहीं है, बात तो बिलकुल सादा है
दिल ही पर कुर्बान हुए, और दिल ही को बीमार किया
शीशे टूटे या दिल टूटे खुश्क लबो पर मौत लिए
जो कोई भी कर न सका वह हमने आख़िरकार किया
"नाज़" तेरे जख्मी हाथो ने जो भी किया अच्छा ही किया
तुने सब कि मांग सजी, हर इक का सिंगार किया
- मीना कुमारी
मायने- सरशार=उन्मत
आपको बता दे मीना कुमारी जी "नाज" तखल्लुस से लिखती थी
कारवा गुजर गया, गुबार देखते रहे - गोपालदास नीरज
स्वप्न भरे फूल से,
मीत चुभे शूल से,
लुट गए सिंगार सभी बाग़ के बाबुल से,
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे
करवा गुजर गया, गुबार देखते रहे
नींद भी खुली न थी कि हाय धुप ढल गई,
पाँव जब तलक उठे कि जिन्दगी फिसल गई,
पातपात जहर गए कि शाख-शाख जल गई,
छह तो निकल सकी न, पर उम्र निकल गई,
गीत अश्क बन गए,
छंद हो दफ़न गए,
साथ के सभी दिए धुआ-धुआ पहन गए,
और हम झुके-झुके,
मोड़ पर रुके-रुके,
उम्र के चढाव का उतार देखते रहे
कारवा गुजर गया, गुबार देखते रहे
क्या शबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा,
क्या सुरूर था कि देख आइना सिहर उठा,
इस तरफ जमीं उठी तो आसमान उधर उठा,
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नजर उठा,
एक दिन मगर यहाँ,
ऐसी कुछ हवा चली,
लुट गई कली-कली कि छुट गयी गली-गली,
और हम लूटे-लूटे,
वक़्त से पिटे-पिटे
सास कि शराब का खुमार देखते रहे
कारवा गुजर गया, गुबार देखते रहे
हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद कि सवार दू,
होठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दू,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दू,
और सांस यु कि स्वर्ग भूमि पर उतार दू,
हो सका न कुछ मगर,
शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि दह गए किले बिखर-बिखर,
और हम डरे-डरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मजार देखते रहे
कारवा गुजर गया, गुबार देखते रहे
मांग भर चली कि एक, जब नई-नई किरण,
ढोल के धुमुक उठी, ठुमक उठे चरण-चरण,
शोर मच गया कि चली दुल्हन, चली दुल्हन,
गाँव सब उमड़ पड़ा, बहक उठे नयन-नयन,
पर तभी जहर भरी,
गाज एक वह गिरी,
पूंछ गया सिन्दूर तार-तार हुई चुनरी,
और हम अनजान से,
दूर के मकान से,
पालकी लिए हुए कहार देखते रहे
कारवा गुजर गया, गुबार देखते रहे
- गोपालदास नीरज
कुछ कम है - शहरयार
जिन्दगी जैसी तवक्को थी नहीं, कुछ कम है
हर घडी होता है अहसास कही कुछ कम है
घर कि तामीर तस्सवुर ही में हो सकती है
अपने नक़्शे के मुताबिक यह जमीं कुछ कम है
बिछड़े लोगो से मुलाकात कभी फिर होगी
दिल में उम्मीद तो काफी है, यकीं कुछ कम है
अब जिधर देखिये लगता है कि इस दुनिया में
कही कुछ ज्यादा है, कही कुछ कम है
आज भी है तेरी दूरी ही उदासी का सबब
यह अलग बात कि पहली सी नहीं कुछ कम है
- शहरयार
हर घडी होता है अहसास कही कुछ कम है
घर कि तामीर तस्सवुर ही में हो सकती है
अपने नक़्शे के मुताबिक यह जमीं कुछ कम है
बिछड़े लोगो से मुलाकात कभी फिर होगी
दिल में उम्मीद तो काफी है, यकीं कुछ कम है
अब जिधर देखिये लगता है कि इस दुनिया में
कही कुछ ज्यादा है, कही कुछ कम है
आज भी है तेरी दूरी ही उदासी का सबब
यह अलग बात कि पहली सी नहीं कुछ कम है
- शहरयार
दोस्त बनकर भी नहीं साथ निभानेवाला - अहमद फ़राज़
दोस्त बनकर भी नहीं साथ निभानेवाला
वही अंदाज है जालिम का जमानेवाला
तेरे होते हुए आ जाती थी सारी दुनिया
आज तनहा हु तो कोई नहीं आने वाला
मुन्तजिर किस का हु टूटी हुए दहलीज पे मै
कौन आएगा यहाँ कौन है आनेवाला
मैंने देखा है बहारो में चमन को जलते
है कोई ख्वाब की ताबीर बतानेवाला
तुम तकल्लुफ़ को भी इखलास समझते हो फराज
दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला
- अहमद फराज
कारवा गुजर गया, गुबार देखते रहे - गोपालदास नीरज
स्वप्न भरे फूल से,
मीत चुभे शूल से,
लुट गए सिंगार सभी बाग़ के बाबुल से,
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे
करवा गुजर गया, गुबार देखते रहे
नींद भी खुली न थी कि हाय धुप ढल गई,
पाँव जब तलक उठे कि जिन्दगी फिसल गई,
पातपात जहर गए कि शाख-शाख जल गई,
छह तो निकल सकी न, पर उम्र निकल गई,
गीत अश्क बन गए,
छंद हो दफ़न गए,
साथ के सभी दिए धुआ-धुआ पहन गए,
और हम झुके-झुके,
मोड़ पर रुके-रुके,
उम्र के चढाव का उतार देखते रहे
कारवा गुजर गया, गुबार देखते रहे
क्या शबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा,
क्या सुरूर था कि देख आइना सिहर उठा,
इस तरफ जमीं उठी तो आसमान उधर उठा,
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नजर उठा,
एक दिन मगर यहाँ,
ऐसी कुछ हवा चली,
लुट गई कली-कली कि छुट गयी गली-गली,
और हम लूटे-लूटे,
वक़्त से पिटे-पिटे
सास कि शराब का खुमार देखते रहे
कारवा गुजर गया, गुबार देखते रहे
हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद कि सवार दू,
होठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दू,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दू,
और सांस यु कि स्वर्ग भूमि पर उतार दू,
हो सका न कुछ मगर,
शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि दह गए किले बिखर-बिखर,
और हम डरे-डरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मजार देखते रहे
कारवा गुजर गया, गुबार देखते रहे
मांग भर चली कि एक, जब नई-नई किरण,
ढोल के धुमुक उठी, ठुमक उठे चरण-चरण,
शोर मच गया कि चली दुल्हन, चली दुल्हन,
गाँव सब उमड़ पड़ा, बहक उठे नयन-नयन,
पर तभी जहर भरी,
गाज एक वह गिरी,
पूंछ गया सिन्दूर तार-तार हुई चुनरी,
और हम अनजान से,
दूर के मकान से,
पालकी लिए हुए कहार देखते रहे
कारवा गुजर गया, गुबार देखते रहे
- गोपालदास नीरज
कुछ कम है - शहरयार
जिन्दगी जैसी तवक्को थी नहीं, कुछ कम है
हर घडी होता है अहसास कही कुछ कम है
घर कि तामीर तस्सवुर ही में हो सकती है
अपने नक़्शे के मुताबिक यह जमीं कुछ कम है
बिछड़े लोगो से मुलाकात कभी फिर होगी
दिल में उम्मीद तो काफी है, यकीं कुछ कम है
अब जिधर देखिये लगता है कि इस दुनिया में
कही कुछ ज्यादा है, कही कुछ कम है
आज भी है तेरी दूरी ही उदासी का सबब
यह अलग बात कि पहली सी नहीं कुछ कम है
- शहरयार
हर घडी होता है अहसास कही कुछ कम है
घर कि तामीर तस्सवुर ही में हो सकती है
अपने नक़्शे के मुताबिक यह जमीं कुछ कम है
बिछड़े लोगो से मुलाकात कभी फिर होगी
दिल में उम्मीद तो काफी है, यकीं कुछ कम है
अब जिधर देखिये लगता है कि इस दुनिया में
कही कुछ ज्यादा है, कही कुछ कम है
आज भी है तेरी दूरी ही उदासी का सबब
यह अलग बात कि पहली सी नहीं कुछ कम है
- शहरयार
दोस्त बनकर भी नहीं साथ निभानेवाला - अहमद फ़राज़
दोस्त बनकर भी नहीं साथ निभानेवाला
वही अंदाज है जालिम का जमानेवाला
तेरे होते हुए आ जाती थी सारी दुनिया
आज तनहा हु तो कोई नहीं आने वाला
मुन्तजिर किस का हु टूटी हुए दहलीज पे मै
कौन आएगा यहाँ कौन है आनेवाला
मैंने देखा है बहारो में चमन को जलते
है कोई ख्वाब की ताबीर बतानेवाला
तुम तकल्लुफ़ को भी इखलास समझते हो फराज
दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला
- अहमद फराज
तुम चली जाओगी, परछाईया रह जायेगी - साहिर लुधियानवी
तुम चली जाओगी, परछाईया रह जायेगी
कुछ न कुछ हुस्न कि रानाइया रह जायेगी
तुम तो इस झील के साहिल पे मिली हो
मुझ से जब भी देखूंगा यही मुझ को नजर आओगी
याद मिटती है न मंजर कोई मिट सकता है
दूर जाकर भी तुम अपने को यही पाओगी
खुल के रह जायेगी झोको में बदन कि खुशबू
जुल्फ का अक्स घटाओ में रहेगा सदियों
फूल चुपके से चुरा लेंगे लबो कि सुर्खी
यह जवान हुस्न फिजाओ में रहेगा सदियों
इस धडकती हुई शादाब-ओ-हसी वादी में
यह न समझो कि ज़रा देर का किस्सा हो तुम
अब हमेशा के लिए मेरे मुक्कद्दर कि तरह
इन नजरो के मुक्कद्दर का भी हिस्सा हो तुम
तुम चली जाओगी, परछाईया रह जायेगी
कुछ न कुछ हुस्न कि रानाइया रह जायेगी
- साहिर लुधियानवी
कटेगा देखिये दिन जाने किस अजब के साथ - शहरयार

की आज धुप नहीं निकली आफ़ताब के साथ
तो फिर बताओ समुन्दर सदा को क्यों सुनते
हमारी प्यास का रिश्ता था जब सराब के साथ
बड़ी अजीब महक साथ ले के आई है
नसीम रात बसर की किसी गुलाब के साथ
फिजा में दूर तक मरहबा के नारे है
गुजरने वाले है कुछ लोग यहा से ख्वाब के साथ
जमीन तेरी कशिश खिचती रही हमको
गए जरूर थे कुछ दूर माहताब के साथ
- शहरयार
मायने
सराब = मिराज
तुम चली जाओगी, परछाईया रह जायेगी - साहिर लुधियानवी
तुम चली जाओगी, परछाईया रह जायेगी
कुछ न कुछ हुस्न कि रानाइया रह जायेगी
तुम तो इस झील के साहिल पे मिली हो
मुझ से जब भी देखूंगा यही मुझ को नजर आओगी
याद मिटती है न मंजर कोई मिट सकता है
दूर जाकर भी तुम अपने को यही पाओगी
खुल के रह जायेगी झोको में बदन कि खुशबू
जुल्फ का अक्स घटाओ में रहेगा सदियों
फूल चुपके से चुरा लेंगे लबो कि सुर्खी
यह जवान हुस्न फिजाओ में रहेगा सदियों
इस धडकती हुई शादाब-ओ-हसी वादी में
यह न समझो कि ज़रा देर का किस्सा हो तुम
अब हमेशा के लिए मेरे मुक्कद्दर कि तरह
इन नजरो के मुक्कद्दर का भी हिस्सा हो तुम
तुम चली जाओगी, परछाईया रह जायेगी
कुछ न कुछ हुस्न कि रानाइया रह जायेगी
- साहिर लुधियानवी
कटेगा देखिये दिन जाने किस अजब के साथ - शहरयार

की आज धुप नहीं निकली आफ़ताब के साथ
तो फिर बताओ समुन्दर सदा को क्यों सुनते
हमारी प्यास का रिश्ता था जब सराब के साथ
बड़ी अजीब महक साथ ले के आई है
नसीम रात बसर की किसी गुलाब के साथ
फिजा में दूर तक मरहबा के नारे है
गुजरने वाले है कुछ लोग यहा से ख्वाब के साथ
जमीन तेरी कशिश खिचती रही हमको
गए जरूर थे कुछ दूर माहताब के साथ
- शहरयार
मायने
सराब = मिराज
यु कभी-कभी तो नजारा करेंगे हम - मीना कुमारी
यु कभी-कभी तो नजारा करेंगे हम
पहना करो नकाब, उतारा करेंगे हम
महताब कि जबी पे पसीने को देखना
जब नाम लेके तुमको पुकारा करेंगे हम
हमसे इबादतों में कमी रह गई अगर
रह-रह के अपने माथे पे मारा करेंगे हम
मंजिल से मिल सका न हमे गर कोई जवाब
मुड-मुड के फिर से तुमको पुकारा करेंगे हम
वक्ते सहर जो रात कि लो झिलमिला गई
उठ कर तुम्हारी जुल्फ सवारा करेंगे हम
- मीना कुमारी
मायने-
महताब=चाँद, जबा=माथा, सहर= सुबह
पहना करो नकाब, उतारा करेंगे हम
महताब कि जबी पे पसीने को देखना
जब नाम लेके तुमको पुकारा करेंगे हम
हमसे इबादतों में कमी रह गई अगर
रह-रह के अपने माथे पे मारा करेंगे हम
मंजिल से मिल सका न हमे गर कोई जवाब
मुड-मुड के फिर से तुमको पुकारा करेंगे हम
वक्ते सहर जो रात कि लो झिलमिला गई
उठ कर तुम्हारी जुल्फ सवारा करेंगे हम
- मीना कुमारी
मायने-
महताब=चाँद, जबा=माथा, सहर= सुबह
यु कभी-कभी तो नजारा करेंगे हम - मीना कुमारी
यु कभी-कभी तो नजारा करेंगे हम
पहना करो नकाब, उतारा करेंगे हम
महताब कि जबी पे पसीने को देखना
जब नाम लेके तुमको पुकारा करेंगे हम
हमसे इबादतों में कमी रह गई अगर
रह-रह के अपने माथे पे मारा करेंगे हम
मंजिल से मिल सका न हमे गर कोई जवाब
मुड-मुड के फिर से तुमको पुकारा करेंगे हम
वक्ते सहर जो रात कि लो झिलमिला गई
उठ कर तुम्हारी जुल्फ सवारा करेंगे हम
- मीना कुमारी
मायने-
महताब=चाँद, जबा=माथा, सहर= सुबह
पहना करो नकाब, उतारा करेंगे हम
महताब कि जबी पे पसीने को देखना
जब नाम लेके तुमको पुकारा करेंगे हम
हमसे इबादतों में कमी रह गई अगर
रह-रह के अपने माथे पे मारा करेंगे हम
मंजिल से मिल सका न हमे गर कोई जवाब
मुड-मुड के फिर से तुमको पुकारा करेंगे हम
वक्ते सहर जो रात कि लो झिलमिला गई
उठ कर तुम्हारी जुल्फ सवारा करेंगे हम
- मीना कुमारी
मायने-
महताब=चाँद, जबा=माथा, सहर= सुबह
ये काफिले यादो के कही खो गए होते - शहरयार
ये काफिले यादो के कही खो गए होते
इक पल भी अगर भूल से हम सो गए होते
ऐ शहर तीर नामो-निशा भी नहीं होता
जो हादसे होने थे अगर हो गए होते
हर बार पलटते हुए घर को यही सोचा
ऐ काश किसी लम्बे सफ़र को गए होते
हम खुश है हमें धुप विरासत में मिली है
अजदाद कही पेड़ भी कुछ बो गए होते
किस मुह से कहे तुझसे समन्दर के है हकदार
सैराब सराबो से भी हम हो गए होते
- शहरयार
चैन दिल को रात भर आता न था - शहरयार
शाम तक जब कोई घर आता न था
चैन दिल को रात भर आता न था
बंद रखते अपनी आँखे हम सभी
चाँद जब तक बाम पर आता न था
दूर तक चलते थे सहराओ में हम
देर तक कोई शजर आता न था
इक उफक पे जा के रूक जाती निगाह
और फिर कुछ भी नजर आता न था
दश्ते-तन्हाई का वो लम्बा सफ़र
याद कोई हमसफ़र आता न था
सिर्फ अफसुर्दादिली को क्या कहे
हमको जीने का हुनर आता न था
- शहरयार
मायने
बाम-छत, सहराओं-रेगिस्तानो, उफक-क्षतिज, दश्ते-तन्हाई=अकेलेपन का जंगल, अफसुर्दादिली-उदासी
चैन दिल को रात भर आता न था
बंद रखते अपनी आँखे हम सभी
चाँद जब तक बाम पर आता न था
दूर तक चलते थे सहराओ में हम
देर तक कोई शजर आता न था
इक उफक पे जा के रूक जाती निगाह
और फिर कुछ भी नजर आता न था
दश्ते-तन्हाई का वो लम्बा सफ़र
याद कोई हमसफ़र आता न था
सिर्फ अफसुर्दादिली को क्या कहे
हमको जीने का हुनर आता न था
- शहरयार
मायने
बाम-छत, सहराओं-रेगिस्तानो, उफक-क्षतिज, दश्ते-तन्हाई=अकेलेपन का जंगल, अफसुर्दादिली-उदासी
हिज्र कि लम्बी रात का खौफ निकल जाये - शहरयार
हिज्र कि लम्बी रात का खौफ निकल जाये
आँखों पर फिर नींद का जादू चल जाये
बड़ी भयानक साअत आने वाली है
आओ जातां कर देखे शायद टल जाये
मै फिर कागज कि किश्ती पर आता हु
दरिया से कहला दो ज़रा संभल जाये
या मै सोचु कुछ भी न उसके बारे में
या ऐसा हो दुनिया और बदल जाये
जितनी प्यास है उससे ज्यादा पानी हो
मुमकिन है ऐ काश ये खतरा टल जाये
- शहरयार
मायने
साअत=घडी
आँखों पर फिर नींद का जादू चल जाये
बड़ी भयानक साअत आने वाली है
आओ जातां कर देखे शायद टल जाये
मै फिर कागज कि किश्ती पर आता हु
दरिया से कहला दो ज़रा संभल जाये
या मै सोचु कुछ भी न उसके बारे में
या ऐसा हो दुनिया और बदल जाये
जितनी प्यास है उससे ज्यादा पानी हो
मुमकिन है ऐ काश ये खतरा टल जाये
- शहरयार
मायने
साअत=घडी
समझौता कोई ख्वाब के बदले नहीं होगा - शहरयार
जो चाहती है दुनिया वो मुझसे नहीं होगा
समझौता कोई ख्वाब के बदले नहीं होगा
अब रात कि दिवार को ढाना है जरुरी
ये काम मगर मुझसे अकेले नहीं होगा
खुशफहमी अभी तक थी यही कारे-जुनू मे
जो मै नहीं कर पाया किसी से नहीं होगा
तदबीर नयी सोच कोई ऐ दिले-सादा
माइल-ब-करम तुझपे वो ऐसे नहीं होगा
बेनाम से इक खौफ से दिल क्यों है परेशा
जब तय है कि कुछ वक़्त से पहले नहीं होगा
- शहरयार
मायने
कारे-जुनू=उन्माद, तदबीर=उपाय, माइल-ब-करम=कृपालु
समझौता कोई ख्वाब के बदले नहीं होगा
अब रात कि दिवार को ढाना है जरुरी
ये काम मगर मुझसे अकेले नहीं होगा
खुशफहमी अभी तक थी यही कारे-जुनू मे
जो मै नहीं कर पाया किसी से नहीं होगा
तदबीर नयी सोच कोई ऐ दिले-सादा
माइल-ब-करम तुझपे वो ऐसे नहीं होगा
बेनाम से इक खौफ से दिल क्यों है परेशा
जब तय है कि कुछ वक़्त से पहले नहीं होगा
- शहरयार
मायने
कारे-जुनू=उन्माद, तदबीर=उपाय, माइल-ब-करम=कृपालु
आइनों को तोड़ कर पछताओगे - शहरयार
आइनों को तोड़ कर पछताओगे
जब बदी के फुल महकेंगे यहाँ
नेकियो पर अपनी तुम शरमाओगे
सच को पहले लफ्ज़ फिर लब देंगे हम
तुम हमेशा झूठ को झुठलाओगे
फैलता जायेगा सहरा-ए-सुकूत
दूर कि आवाज़ बनते जाओगे
सारी सम्ते बेकशिश हो जायेगी
घूम फिर कर फिर यही आ जाओगे
रूह कि दिवार के गिरने के बाद
रूह कि दिवार के गिरने के बाद
बेबदन हो जाओगे मर जाओगे
- शहरयार
मायने
बदी=बुराई, सहरा-ए-सुकूत=मौन का रेगिस्तान, सम्ते=दिशाए, बेकशिश=अनाकर्षक
ये काफिले यादो के कही खो गए होते - शहरयार
ये काफिले यादो के कही खो गए होते
इक पल भी अगर भूल से हम सो गए होते
ऐ शहर तीर नामो-निशा भी नहीं होता
जो हादसे होने थे अगर हो गए होते
हर बार पलटते हुए घर को यही सोचा
ऐ काश किसी लम्बे सफ़र को गए होते
हम खुश है हमें धुप विरासत में मिली है
अजदाद कही पेड़ भी कुछ बो गए होते
किस मुह से कहे तुझसे समन्दर के है हकदार
सैराब सराबो से भी हम हो गए होते
- शहरयार
चैन दिल को रात भर आता न था - शहरयार
शाम तक जब कोई घर आता न था
चैन दिल को रात भर आता न था
बंद रखते अपनी आँखे हम सभी
चाँद जब तक बाम पर आता न था
दूर तक चलते थे सहराओ में हम
देर तक कोई शजर आता न था
इक उफक पे जा के रूक जाती निगाह
और फिर कुछ भी नजर आता न था
दश्ते-तन्हाई का वो लम्बा सफ़र
याद कोई हमसफ़र आता न था
सिर्फ अफसुर्दादिली को क्या कहे
हमको जीने का हुनर आता न था
- शहरयार
मायने
बाम-छत, सहराओं-रेगिस्तानो, उफक-क्षतिज, दश्ते-तन्हाई=अकेलेपन का जंगल, अफसुर्दादिली-उदासी
चैन दिल को रात भर आता न था
बंद रखते अपनी आँखे हम सभी
चाँद जब तक बाम पर आता न था
दूर तक चलते थे सहराओ में हम
देर तक कोई शजर आता न था
इक उफक पे जा के रूक जाती निगाह
और फिर कुछ भी नजर आता न था
दश्ते-तन्हाई का वो लम्बा सफ़र
याद कोई हमसफ़र आता न था
सिर्फ अफसुर्दादिली को क्या कहे
हमको जीने का हुनर आता न था
- शहरयार
मायने
बाम-छत, सहराओं-रेगिस्तानो, उफक-क्षतिज, दश्ते-तन्हाई=अकेलेपन का जंगल, अफसुर्दादिली-उदासी
हिज्र कि लम्बी रात का खौफ निकल जाये - शहरयार
हिज्र कि लम्बी रात का खौफ निकल जाये
आँखों पर फिर नींद का जादू चल जाये
बड़ी भयानक साअत आने वाली है
आओ जातां कर देखे शायद टल जाये
मै फिर कागज कि किश्ती पर आता हु
दरिया से कहला दो ज़रा संभल जाये
या मै सोचु कुछ भी न उसके बारे में
या ऐसा हो दुनिया और बदल जाये
जितनी प्यास है उससे ज्यादा पानी हो
मुमकिन है ऐ काश ये खतरा टल जाये
- शहरयार
मायने
साअत=घडी
आँखों पर फिर नींद का जादू चल जाये
बड़ी भयानक साअत आने वाली है
आओ जातां कर देखे शायद टल जाये
मै फिर कागज कि किश्ती पर आता हु
दरिया से कहला दो ज़रा संभल जाये
या मै सोचु कुछ भी न उसके बारे में
या ऐसा हो दुनिया और बदल जाये
जितनी प्यास है उससे ज्यादा पानी हो
मुमकिन है ऐ काश ये खतरा टल जाये
- शहरयार
मायने
साअत=घडी
समझौता कोई ख्वाब के बदले नहीं होगा - शहरयार
जो चाहती है दुनिया वो मुझसे नहीं होगा
समझौता कोई ख्वाब के बदले नहीं होगा
अब रात कि दिवार को ढाना है जरुरी
ये काम मगर मुझसे अकेले नहीं होगा
खुशफहमी अभी तक थी यही कारे-जुनू मे
जो मै नहीं कर पाया किसी से नहीं होगा
तदबीर नयी सोच कोई ऐ दिले-सादा
माइल-ब-करम तुझपे वो ऐसे नहीं होगा
बेनाम से इक खौफ से दिल क्यों है परेशा
जब तय है कि कुछ वक़्त से पहले नहीं होगा
- शहरयार
मायने
कारे-जुनू=उन्माद, तदबीर=उपाय, माइल-ब-करम=कृपालु
समझौता कोई ख्वाब के बदले नहीं होगा
अब रात कि दिवार को ढाना है जरुरी
ये काम मगर मुझसे अकेले नहीं होगा
खुशफहमी अभी तक थी यही कारे-जुनू मे
जो मै नहीं कर पाया किसी से नहीं होगा
तदबीर नयी सोच कोई ऐ दिले-सादा
माइल-ब-करम तुझपे वो ऐसे नहीं होगा
बेनाम से इक खौफ से दिल क्यों है परेशा
जब तय है कि कुछ वक़्त से पहले नहीं होगा
- शहरयार
मायने
कारे-जुनू=उन्माद, तदबीर=उपाय, माइल-ब-करम=कृपालु
आइनों को तोड़ कर पछताओगे - शहरयार
आइनों को तोड़ कर पछताओगे
जब बदी के फुल महकेंगे यहाँ
नेकियो पर अपनी तुम शरमाओगे
सच को पहले लफ्ज़ फिर लब देंगे हम
तुम हमेशा झूठ को झुठलाओगे
फैलता जायेगा सहरा-ए-सुकूत
दूर कि आवाज़ बनते जाओगे
सारी सम्ते बेकशिश हो जायेगी
घूम फिर कर फिर यही आ जाओगे
रूह कि दिवार के गिरने के बाद
रूह कि दिवार के गिरने के बाद
बेबदन हो जाओगे मर जाओगे
- शहरयार
मायने
बदी=बुराई, सहरा-ए-सुकूत=मौन का रेगिस्तान, सम्ते=दिशाए, बेकशिश=अनाकर्षक
शोला था जल बुझा हु, हवाए मुझे न दो - अहमद फ़राज़
शोला था जल बुझा हु, हवाए मुझे न दो
मै कब का जा चुका हु, सदाए मुझे न दो
जो जहर पी चुका हु तुम्ही ने मुझे दिया
अब तुम तो जिन्दगी कि दुआए मुझे न दो
यह भी बड़ा करम है सलामत है जिस्म अभी
ऐ खुसर्वाने-शहर, कबाए मुझे न दो
ऐसा न हो कभी कि पलट कर न आ सकू
हर बार दूर जा के सदाए मुझे न दो
कब मुझको ऐतराफे-मुह्हबत न था फ़राज़
कब मैंने यह कहा था, सजाए मुझे न दो
- अहमद फ़राज़
मायने
सदा- आवाज, खुसर्वाने-शहर=नगर शासक, काबाए-सम्मानित लिबास, ऐतराफे-मुह्हबत=प्रेम कि स्वीकारोक्ति
धुप हु, साया-ए-दीदार से डर जाता हु - जाजिब कुरैशी
धुप हु, साया-ए-दीदार से डर जाता हु
तुझसे मिलता हु तो कुछ और बिखर जाता हु
सहिलो पर मुझे आवाज न देना कोई
आग जिस सिम्त लगी हो मै उधर जाता हु
तू नहीं है तो ख्यालो के अजब मौसम है
जाने किस सोच में चलता हु ठहर जाता हु
आसमा-रंग समुन्दर है तआकुब में मेरे
प्यास लगती है तो सहरा में उतर जाता हु
रूह जलती है बहुत जिस्म पिघलता है बहुत
और मै शहर के जंगल से गुजार जाता हु
किसकी आँखों ने मेरे अक्स पहन रखे है
खुद से मिलना हो तो उस शख्स के घर जाता हु
- जाजिब कुरैशी
तुझसे मिलता हु तो कुछ और बिखर जाता हु
सहिलो पर मुझे आवाज न देना कोई
आग जिस सिम्त लगी हो मै उधर जाता हु
तू नहीं है तो ख्यालो के अजब मौसम है
जाने किस सोच में चलता हु ठहर जाता हु
आसमा-रंग समुन्दर है तआकुब में मेरे
प्यास लगती है तो सहरा में उतर जाता हु
रूह जलती है बहुत जिस्म पिघलता है बहुत
और मै शहर के जंगल से गुजार जाता हु
किसकी आँखों ने मेरे अक्स पहन रखे है
खुद से मिलना हो तो उस शख्स के घर जाता हु
- जाजिब कुरैशी
शोला था जल बुझा हु, हवाए मुझे न दो - अहमद फ़राज़
शोला था जल बुझा हु, हवाए मुझे न दो
मै कब का जा चुका हु, सदाए मुझे न दो
जो जहर पी चुका हु तुम्ही ने मुझे दिया
अब तुम तो जिन्दगी कि दुआए मुझे न दो
यह भी बड़ा करम है सलामत है जिस्म अभी
ऐ खुसर्वाने-शहर, कबाए मुझे न दो
ऐसा न हो कभी कि पलट कर न आ सकू
हर बार दूर जा के सदाए मुझे न दो
कब मुझको ऐतराफे-मुह्हबत न था फ़राज़
कब मैंने यह कहा था, सजाए मुझे न दो
- अहमद फ़राज़
मायने
सदा- आवाज, खुसर्वाने-शहर=नगर शासक, काबाए-सम्मानित लिबास, ऐतराफे-मुह्हबत=प्रेम कि स्वीकारोक्ति
धुप हु, साया-ए-दीदार से डर जाता हु - जाजिब कुरैशी
धुप हु, साया-ए-दीदार से डर जाता हु
तुझसे मिलता हु तो कुछ और बिखर जाता हु
सहिलो पर मुझे आवाज न देना कोई
आग जिस सिम्त लगी हो मै उधर जाता हु
तू नहीं है तो ख्यालो के अजब मौसम है
जाने किस सोच में चलता हु ठहर जाता हु
आसमा-रंग समुन्दर है तआकुब में मेरे
प्यास लगती है तो सहरा में उतर जाता हु
रूह जलती है बहुत जिस्म पिघलता है बहुत
और मै शहर के जंगल से गुजार जाता हु
किसकी आँखों ने मेरे अक्स पहन रखे है
खुद से मिलना हो तो उस शख्स के घर जाता हु
- जाजिब कुरैशी
तुझसे मिलता हु तो कुछ और बिखर जाता हु
सहिलो पर मुझे आवाज न देना कोई
आग जिस सिम्त लगी हो मै उधर जाता हु
तू नहीं है तो ख्यालो के अजब मौसम है
जाने किस सोच में चलता हु ठहर जाता हु
आसमा-रंग समुन्दर है तआकुब में मेरे
प्यास लगती है तो सहरा में उतर जाता हु
रूह जलती है बहुत जिस्म पिघलता है बहुत
और मै शहर के जंगल से गुजार जाता हु
किसकी आँखों ने मेरे अक्स पहन रखे है
खुद से मिलना हो तो उस शख्स के घर जाता हु
- जाजिब कुरैशी
जो होता है सह लेते है कैसे है बेचारे लोग - जावेद अख्तर
दुःख के जंगल में फिरते है कब से मारे-मारे लोग
जीवन-जीवन हमने जग में खेल यही होते देखा
धीरे-धीरे जीती दुनिया धीरे-धीरे हारे लोग
वक्त सिहासन पर बेठा है अपने राग सुनाता है
संगत देने को पाते है साँसों के इकतारे लोग
नेकी इक दिन काम आती है हमको क्या समझते हो
हमने बेबस मरते देखे कैसे प्यारे-प्यारे लोग
इक नगरी में क्यों मिलती है रोटी सपनो के बदले
जिनकी नगरी है वो जाने हम ठहरे बंजारे लोग
- जावेद अख्तर
जो होता है सह लेते है कैसे है बेचारे लोग
जीवन-जीवन हमने जग में खेल यही होते देखा
धीरे-धीरे जीती दुनिया धीरे-धीरे हारे लोग
वक्त सिहासन पर बेठा है अपने राग सुनाता है
संगत देने को पाते है साँसों के इकतारे लोग
नेकी इक दिन काम आती है हमको क्या समझते हो
हमने बेबस मरते देखे कैसे प्यारे-प्यारे लोग
इक नगरी में क्यों मिलती है रोटी सपनो के बदले
जिनकी नगरी है वो जाने हम ठहरे बंजारे लोग
- जावेद अख्तर
वो मुझसे जीत भी सकता था जाने क्यों हारा - जावेद अख्तर
मै पा न सका कभी इस खलिश से छुटकारा
वो मुझसे जीत भी सकता था जाने क्यों हारा
बरस के खुल गए आसू निथर गई है फिजा
चमक रहा है सरे-शाम दर्द का तारा
किसी कि आँख से टपका था एक अमानत है
मेरी हथेली पे रक्खा हुआ ये अंगारा
जो पर समेटे तो एक शाख भी नहीं पाई
खुले थे पर तो मेरा आसमान था सारा
वो साप छोड़ दे डसना ये मै भी कहता हु
मगर न छोड़ेंगे लोग उसको गर न पुकारा
- जावेद अख्तर
जिसे निगाह मिली उसे इंतजार मिला - निदा फाजली
जहानतो को कहा कब्र से फरार मिला
जिसे निगाह मिली उसे इंतजार मिला
वो कोई रह का पत्त्थर हो या हसी मंजर
जहा से रास्ता ठहरा वही मंजर मिला
कोई पुकार रहा था खुली फजाओ से
नजर उठाई तो चारो तरफ हिसार मिला
हर एक सांस न जाने थी जुस्तजू किसकी
हर एक दायर मुसाफिर को बेदयार मिला
ये शहर है कि नुमाइश लगी हुई है कोई
जो आदमी भी मिला बनके इश्तहार मिला
- निदा फाजली
मायने
जहानत - विवेक, कब्र - व्याकुलता, हिसार - घेरा, दयार- घर/स्थान , नुमाइश-प्रदशर्नी/दिखावा.
जो होता है सह लेते है कैसे है बेचारे लोग - जावेद अख्तर
दुःख के जंगल में फिरते है कब से मारे-मारे लोग
जीवन-जीवन हमने जग में खेल यही होते देखा
धीरे-धीरे जीती दुनिया धीरे-धीरे हारे लोग
वक्त सिहासन पर बेठा है अपने राग सुनाता है
संगत देने को पाते है साँसों के इकतारे लोग
नेकी इक दिन काम आती है हमको क्या समझते हो
हमने बेबस मरते देखे कैसे प्यारे-प्यारे लोग
इक नगरी में क्यों मिलती है रोटी सपनो के बदले
जिनकी नगरी है वो जाने हम ठहरे बंजारे लोग
- जावेद अख्तर
जो होता है सह लेते है कैसे है बेचारे लोग
जीवन-जीवन हमने जग में खेल यही होते देखा
धीरे-धीरे जीती दुनिया धीरे-धीरे हारे लोग
वक्त सिहासन पर बेठा है अपने राग सुनाता है
संगत देने को पाते है साँसों के इकतारे लोग
नेकी इक दिन काम आती है हमको क्या समझते हो
हमने बेबस मरते देखे कैसे प्यारे-प्यारे लोग
इक नगरी में क्यों मिलती है रोटी सपनो के बदले
जिनकी नगरी है वो जाने हम ठहरे बंजारे लोग
- जावेद अख्तर
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