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कमाले-जब्त को खुद भी आजमाउगी
मै अपने हाथ से उसकी दुल्हन सजाउगी!

सुपुर्द करके उसे चांदनी के हाथो में
में अपने घर के अंधेरो में लौट आउंगी!

बदन के करब को वह भी समझ न पाएगा
में दिल में रोउंगी, आँखों में मुस्कुराउँगी !

वह क्या गया की रिफाकत के सारे लुत्फ़ गए
में किस्से रूठ सकुगी, किसे मनाउगी !

अब फन तो किसी और से हुआ मंसूब
में किसकी नज्म अकेले में गुनगुनाउगी !

वह एक रिश्ता-ए-बेनाम भी नहीं लेकिन
में अब उसके इशारो पे सर झुकांउगी ! -परवीन शाकिर
मायने
कमले-जब्त=सहन शक्ति, क़र्ब=बैचेनी, रिफाकत=साथ, मंसूब=जुड़ गया

Roman

kamale-jabt ko khud bhi aajmaungi
mai apne haath se uski dulhan sajaungi

supurd karke use chandni ke haatho me
mai apne ghar ke andhero me lout aaungi

badan ke karab ko wah bhi samajh n paayega
mai dil me roungi , aankho me muskuraungi

waha kya gaya ki rifaqat ke saare lutf gaye
mai kisse ruth sakungi, kise manaungi

ab fan to kisi aur se hua mansub
mai kiski najm akele me gungunaungi

wah ek rishtae-e-benam bhi nahi lekin
mai ab uske ishare pe sar jhukaungi - Parveen Shakir

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